कविता संग्रह ‘माया दर्पण’ से

लगभग सड़कों ही सड़कों भागता हुआ बियाबान
उल्लुओं का दिवास्वप्न
चुकते कलाकारों के शहरों और टोलों पर
औरतें
सोफों पर, नहीं तो
किचन में,
कवि खटोलों पर।

उल्लुओं की चुंधी हुई
नज़रों के लिए
प्रिय दृश्य जुटाने का कार्यक्रम।

शहरों के चिह्न
शहरों के चिह्न
और
प्रेम के मलबे पर
बैठी हुई
कवियों की मूर्ख प्रियतमाएँ
माँग रही हैं
स्नान में गुनगुनाने के लिए
एक पंक्ति
और जुड़े में खोंसने के लिए
एक साफ
झूठ।

लगभग सड़कों ही सड़कों भागता हुआ उल्लुओं का दिवास्वप्न और कुछ उन्हीं सड़कों पर दुनिया नामक एक बेवा का शव अपने कन्धों पर उठाये हुए भाड़े के लोग तथा काले कपड़े पहने गायक और कवि आपस में एक दूसरे के शोक-गीत की दाद देते हुए व शव-यात्रा कभी भी समाप्त न होने की प्रार्थना करते हुए चले जा रहे हैं पता नहीं किधर.. दुनिया जिधर कभी नहीं गयी थी..

(उल्लुओं का कोरस ॐ शान्ति)

अस्तु-
लोगों के चिह्न
तथा अबके अकारण
अवतार
ढूँढ रहे हैं
पृथ्वी से ऊबकर आकाश
आकाश से ऊबकर
पाताल
(बीवी से ऊबकर
साहित्य
बच्चा से ऊबकर
भविष्य)

तथास्तु-
प्रभु के चरण-चिह्नों पर
चली जा रही हैं
दो बूढ़ी औरतें
रसातल की ओर। सभ्यता और संस्कृति।