एक ऐसा भी शृंगार हो

एक शृंगार ऐसा भी हो…

मुख चंद्र समान हो ना भले,
पर दया शीलता का भाव हो।
झुर्रीयाँ करे तांडव ही भले,
मुख तेज सूर्य समान हो।

मृग तुल्य चक्षु हो ना भले,
पर दृष्टि बाज़ समान हो।
घृणा, कपट, दम्भ दूर हो,
आँखों से झलकता प्यार हो।

मन हो तरुण, चंचल, सरल,
कोमल, पवित्र, व्यवहार हो।
ना ईर्ष्या हो ना द्वेष हो,
ना कपटी मानव भेष हो।

लालिमा होंठो पर हो ना भले,
पर वाणी कोयल समान हो।
जब खुले तो मृदु रसधार बहे,
स्नेह की पवित्र बौछार हो।

जो टले ना टाले तूफानों से,
विश्वास स्वयं पर अगाध हो।
हिल जो ना सके प्रतिकूल प्रहारों से,
प्रण हो तो इतना प्रगाण हो।

मन में आशाओं की नित,
अग्नि प्रदीप्त हो प्रज्वलित।
काल कल्पित आशा हो न मगर,
दृढ़ विश्वास इसमें व्याप्त हो।

हृदय वृहद् हो इतना जिसमें,
समाता अखंड संसार हो।
ना पंथ विशेष का प्रभाव हो,
बस मानवता का ज्ञान हो।

जो बने मिलकर इन भावों से,
एक ऐसा भी शृंगार हो…
एक ऐसा भी शृंगार हो…