इक ही अक्स उभरता है अंधेरों में ‘प्रहेलिका’

इक ही अक्स उभरता है अंधेरों में ‘प्रहेलिका’
कि जले चिराग बहुत दिल को उजाले न मिले।

बदन की भूख है भारी इशक की बज्मों में,
मची हैं होड़ बहुत, रूह को निवाले न मिले।

भीड़ में ढूंढती रहती है न जाने किसको?
कि इस निगाह को मुकम्मल नजारे न मिले।

अब निकल ही पड़े है, उठाके बोरिया-बिस्तर,
इस शहर में ठौर-ठिकाने के बहाने न मिले।

उम्र-दराज सा इक इश्क जिया लम्हों में,
हिसाब-किताब लगा सकने के जमाने न मिले।

यूं तो बाद मेरे भी रहेंगे लफ्ज़ ये जिंदा सारे,
फकत जीते जी जुगनुओं को सितारे न मिले।

लहरों की चाल ‘प्रहेलिका’ कौन समझ पाया है,
अबकी  तो बा-खुदा को किनारे न मिले।