एक नज़्म बुनता रहता हूँ

आँखों के सन्नाटे
इंतज़ार की सड़क पर
जब खड़े रहते हैं और
ढलती हुई शाम अपने कंधों
पर बोझिल रात का बोझ
लेके पहाड़ों पर उदास
बैठी रहती है
तब ख़यालों की हवा में
बहती हुई तुम्हारी याद
एक नज़्म बनकर
मेरे ज़हन की शाख
पर लगे माज़ी के ज़र्द पत्ते
दिल की ज़मीन पर
गिरा देती है
और मैं सारी रात
उन पत्तों को समेटता
रहता हूँ…
एक नज़्म बुनता रहता हूँ…