Shiva-
कभी आँखों से लिख दो कुछ
मेरी आखों पर
कि हया की हर झुकी नज़र का
गुनेहगार तुम्हारा ज़िक्र हो
और दुआ में उठी पलकें
वहां ऊपर भी तुम्हें ही पायें

Puneet-
तुम आँखों पर लिखने की बात करती हो?
मैं तो इन् आँखों को ही अपने नाम लिखने वाला हूँ
मगर इतना तो बता दो
कि हया और दुआ के बहाने
अपनी पलकों को उठा झुका कर
मेरी सासें रोक लेने के पीछे
आखिर तुम्हारा इरादा क्या है?

Shiva-
इरादे बता कर क़त्ल कबसे किये जाने लगे?
बस यूँ समझ लो कि वो जो उधर साँसें तुम्हारी रूकती हैं
यहां मेरी ग़ज़लें जिंदा हो जाती हैं
हाँ मगर दिल को समझा देना
कि ज़रा धीरे धड़का करे
कि अक्सर शोर-ए-शबाब में खता हो जाया करती है

Puneet-
खताएं हों तो हों जाएँ
धडकनों को कैसे धीमा कर दूं?
दिल कोई radio थोड़े ही है
लहू से भरा हिलता डुलता एक गुब्बारा सा है
या तो निकाल बाहर करना होगा सीने से
और उड़ा देना होगा आसमान में
या फिर फोड़ देना होगा भीतर ही
अब तुम्हें मेरी उधड़ी नसों से ही
अपने मिसरों की बेहर नापने की जिद है
तो चलो यही सही

Shiva-
इस शिद्दत से चाहोगे तो ग़ज़लें भी शरमा जायेंगी
नए एहसासों की गर्मी अभी बचा के रखो
शहर-ए-इश्क में सावन में भी बर्फ पड़ा करती है
और इश्क से दूर कहीं और घर बसाया तो
ना जली रोटियों पर प्यार बरसेगा
ना कम्बल की आंच में तराने लिखे जायेंगे
और ना नोक-झोंक करते लबों पर सहसा खिलखिलाहट थिरक पाएगी

Puneet-
देखो, अब तुम बरसात, तरानों और खिलखिलाहट की फ़िक्र मुझ पर छोड़ दो
शहर-ए-इश्क में घर बसे ना बसे
इश्क में शहर होना मैंने सीख लिया है
तुम बस इंतज़ार किया करना
छत पर
छतरी लेकर
मैं बादल बनकर आऊँगा
तुम अपने एहसासों को कलम की नोक पर रखना
मैं स्याही बनकर आऊँगा
तुम झगड़े करने के लिए तैयार बैठी रहना
मैं तुम्हें हँसा देने वाला एक ख़याल बनकर आऊँगा

Shiva-
यूँ आ सकते हो तो आ ही जाओ
मगर बादल बन तकते ना रहना
बरस भी जाना
स्याही बन आओ तो सूख ना जाना
एहसासों से गुफ्तगू लम्बी चलेगी
और हँसाने को बस ख़याल ना बनना
हकीकत में उतर आना
हो सके ऐसा तो हवा में
अपना नाम लिख उछाल देना
मेरा आँचल बेताब है संग उड़ जाने को

Puneet-
उड़ना ही है तुम्हें
तो मेरा नाम ना लो
मेरी हथेलियाँ ले लो
इनपे पाँव रख उछल जाना आकाश में
या फिर यूँ कर लेते हैं कि
मैं तुम्हें पीठ से पकड़ कर
बाँट लेता हूँ खुद को दो हिस्सों में
पंख बन जाता हूँ तुम्हारे
बस इतना ध्यान रखना कि इस उड़ान के बाद
लौट आना है तुम्हें, यहीं इसी घोंसले में
जो मैंने बनाया है अपने जज्बातों के तिनके जोड़ जोड़कर
देखो…
देखो… तूफ़ान आने वाला है..

Shiva-
आसमान का तूफ़ान तो थम जाएगा
हवाओं में इतना जोर नहीं कि जज्बातों का मकान ढा सकें
मगर उस तूफ़ान का क्या जो तुमने दिल में उठा दिया है?
एक कोने से तुम्हारे छोड़ जाने के डर की धुल उड़ रही है
दूजे कोने से तेज आती साएं साएं की आवाज़ में
समाज के प्रश्न सुनाई दे रहे हैं
एक और बिखरे सूखे पत्ते
पिछले तूफ़ान की बर्बादी याद दिला रहे हैं
और बाकी बची जगह में
किसी तरह जो प्यार समेटे बैठी हूँ
वो राह देख रहा है तुम्हारे खिड़कियाँ बंद कर देने की
मेरी आँखों में बहुत धुल है
मुझसे नहीं होगा

Puneet-
खिड़कियाँ? कौन सी खिड़कियाँ?
मुझे तो इस कमरे से बाहर झाँकने तक का कोई जरिया नज़र नहीं आता
और यह जो तुम्हारे डर की धूल है ना
मेरा तुम्हें छोड़ कर जाने का डर
चलो इस पर थोड़ा पानी छिड़क देते हैं
भरोसे का
कवि अपनी कल्पना को कभी छोड़ कर जाता है भला?
और आने दो समाज के सवालों का जितना भी शोर है
आओ मैं ढक लेता हूँ तुम्हारे कानों को अपने हाथों से
तुम अपने हाथ अपनी जेब में डालो
और dude बन जाओ
और ये जो सूखे पत्ते हैं ना
रहने दो इन्हें, यहीं
बीता हुआ पतझड़ आने वाली बहारों की खुशबू कम नहीं कर सकता
इन् सूखे पत्तो की photo खिचेंगे और balcony में लगायेंगे
सूखे पत्तो की photo बड़ी अच्छी आती है
तुम बस अपनी आँखें खोल लो
मैं एक एक कर चुन लूँगा
तुम्हारी आँखों से धुल का एक एक कतरा
तुम्हारी आँखें बंद होती हैं तो लगता है जैसे
सीने में चलता कारखाना बंद हो गया हो

Shiva-
नहीं नहीं.. तुम्हारे सीने में चलता कारखाना बंद नहीं होने चाहिए
मैं प्यार का fuel अब बराबर भिजवाती रहूंगी
जानती नहीं थी सपने भी बनते हैं वहाँ
आँखों की धूल यकायक छट सी रही है
अब सुनाई दे रही है तो वो नज़्म
जो साथ मिल लिखी थी
दिखाई दे रहा है तो ढलता सूरज
जिसके साथ मेरे डर जाते से हैं
और कुछ समझ आ रहा है तो ये
कि समझना बहुत हुआ
चलो दिमाग को आराम दें, दिल को काम पर लगायें
अरे एक मिनट,
अपने facebook account का password नहीं बताया तुमने?

Puneet-
Ummm… मैं… मैं facebook पर नहीं हूँ
तुम्हारी उँगलियों के इशारों के अलावा
मुझे किसी का गुलाम नहीं होना
ना twitter पर हूँ
तुम्हारी आँखों सा नशा किसी topic को trend करने में कहाँ?!
ना ही instagram पसंद मुझे
तुम्हारे होठों सी रंगबाज़ी यह कमबख्त instagram नहीं करता
मुझे तो बस बैठे रहना है तुम्हारी जुल्फों में
वो क्या है ना… वहाँ कोई GPS काम नहीं करता
अच्छा छोड़ो ये सब..
ये बताओ.. momos खाओगी?
चलें?

Shiva-
हाँ चलना तो है
पर इतनी मीठी बातें कह दी तुमने
कि sauce भी मीठी लगेगी
momos छोड़ो.. आज यूँ ही चलते जाते हैं
जब तक रास्ते थक ना जाएँ हमारी बातो से
तुम्हारा धीरे से कान में कुछ कहना
और चंदा का बादलो की आड़ में छुप जाना
तुम्हें गाते हुए मेरा एकटक देखना
और किसी तारे का टिमटिमाना थम जाना
तुम्हारा मेरे बालो से clutcher निकालना
और तभी ठंडी बयार का उन्हें छेड़ जाना
हमारा हाथ पकड़ना
और अचानक सर्दी का बढ़ जाना
यकीन मानो कुदरत की इन साजिशो में
momos से ज्यादा स्वाद है

Puneet-
सच कहती हो तुम
अभी रास्ता तो हमने चम्मच भर ही तय किया है
लेकिन लगता है मानो ज़िन्दगी के सारे स्वाद चख लिए हों
मेरी ये हकीकत
जिसमें तुम शामिल हो
सच कहूँ, इसका ज़ायका बड़ा अच्छा है
और कुदरत साजिश क्यों ना करे
यह चाँद, ये सितारें
सब गवाह हैं
कि कैसे तुम्हारे बालों में बाँध दी थीं मैंने अपनी सारी ख्वाहिशें
इस गिरह को कभी तो खुलना था
और कैसे विरह जल रही थी तुम्हारे और मेरे बीच
सदियों से
फिर इन् हाथो को कभी तो मिलना था
ये मिलन, ये सुकून
और मीठी नींद सा तुम्हारा साथ
कुछ और नहीं हैं ये
जानती हो? कुछ और नहीं हैं ये
ये तुम्हारे और मेरे इश्क का त्यौहार हैं
जिसमें सिर्फ मैं हूँ..
तुम हो..
और ज़िन्दगी? ज़िन्दगी तो अब बस प्यार है..
ज़िन्दगी… बस प्यार है!!!


Shiva

अपने बारे में बताने को कुछ आकर्षक सा हो, इसका तो अभी इंतज़ार ही है।
एक परंपरागत भारतीय लड़की की छवि से ज़्यादा दूर नहीं हूँ। समाज की अनेक बातों से बेचैन, खुद को लेकर बहुत असुरक्षित, दिन में सपने देखती और रात में घर की छत को तकती रहती एक आम लड़की। हर तरह की किताबों से बहुत प्यार करती हूँ, तरह तरह से उन्हें अलमारी में सजाया करती हूँ, और एक ‘विश’ माँगने को बोला जाए तो यही चाहूँगी की हज़ारों किताबों का निचोड़ दिमाग़ में समा जाए।
अपनी असुरक्षाओं से लड़ने के लिए कुछ कुछ लिख लेती हूँ, और लोगों की सच्ची-झूठी तारीफों में सुकून पा लेती हूँ।
लिखने- पढ़ने के अलावा संगीत एक और ऐसी चीज़ है जो मैं कस के अपने पास रखे रहना चाहती हूँ।

  • vaishali · July 2, 2016 at 9:44 am

    इसे महसूस करने के बाद एसा लगता है, मानो इश्क की एक कहानी सी पढ़ली है। शब्दों मे बयां नहीं कर सकती , पर इस तरह से कुछ इश्क की गुफ्तगू पहली बार महसूस की है। बहुत खूब।

      Puneet · July 5, 2016 at 7:01 am

      शुक्रिया वैशाली। पढ़ते रहिएगा 🙂

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