फ़िक्शन

मैं एक युग से इस भ्रम में जीती आयी हूँ कि,
जीवन यात्रा में मैं आकांक्षाओं के पंखों पे सवार हूँ,
पर असल में आकांक्षाएँ तो पानी के बुलबुलों की तरह होती हैं,
जो यथार्थ की एड़ियों में छालों की भांति भिक से फ़ट जाती हैं,
पैदल चलना आखिर क्या है, यह तब ज्ञात होता है।

एक पहाड़ पर चढ़ने और उतरने के बीच केवल एक ही अंतर है,
चढ़ना अगर एक fiction जैसा है,
तो वहीं उतरना उस fiction को लिख रहे लेखक जैसा,
मैं निश्चय नहीं कर पा रही हूँ कि मैं fiction के भीतर बैठी कल्पना हूँ या उससे बाहर निकला हुआ एक काल्पनिक पात्र?