पंखुरी सिन्हा की पाँच कविताएँ

परिचय: पंखुरी सिन्हा कवि और कहानीकार हैं और इनकी कहानी व कविताओं की हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। पंखुरी का नवीनतम कविता संग्रह ‘बहस पार की लम्बी धूप’ 2017 में प्रकाशित हुआ है। किताबों के अलावा इनकी रचनाएँ कई कहानी और कविता संग्रहों के साथ-साथ विभिन्न पत्रिकाओं में भी सम्मिलित हो चुकी हैं। बहुभाषीय अनुवाद,  विभिन्न साहित्यिक पुरस्कार और अवार्ड विनिंग स्क्रिप्ट लेखन भी पंखुरी के उपलब्धियों में शामिल हैं। पंखुरी ने इतिहास से एम. ए. किया है और राष्ट्रीय सहारा टीवी में पत्रकारिता भी कर चुकी हैं। पंखुरी से nilirag18@gmail.com पर संपर्क एवं बात की जा सकती है। 

आज पोषम पा पर पंखुरी सिन्हा की चार उत्कृष्ट कविताएँ प्रस्तुत हैं, पढ़कर देखिए..

वही मुकदमा है प्रेम पर

लगभग वही मुकदमा है प्रेम पर
जो मेरी कविता पर
दोनों को बताया जा रहा है नेगेटिव
अंग्रेजी का एक शब्द
जिससे पहला संज्ञान होता है
एक ब्लड ग्रुप का
खून के एक प्रकार का
देखिये, कितनी अजब जगह है
ये सोशल मीडिया भी
इतने तो हादसे
सड़क हादसे
दीवारों के भीतर के कुकृत्य
रोज़ होते हैं रिपोर्टेड
और रोज़ होती है ज़रूरत
खून की
कुछ हादसे प्रेम के दरमियान भी होते हैं
कई बार, कत्ले आम भी
लेकिन यह कविता प्रेम के
नकारात्मक साबित हो जाने की
दुर्दशा से बचने का एक प्रयास है
और आपसे अनुरोध
कि उसकी और न लें परीक्षा
वह एक बहुत थका हुआ राही है
उसे और न चढ़ाएं
समाज की हज़ार किस्म की स्वचालित सीढ़ियां…

*

सृजन

हज़ार बार डूब उतर कर
एक सी लहरों में
वो गढ़ नहीं पाए
हाड़ मांस का एक बच्चा
अनावृत्त नहीं हो सका
कभी एक का प्रेम
कभी दूसरे को फुरसत नहीं मिली
सागर भी बने के बने रहे
दोनों के बीच
तनी रहीं पतवारें
उन्होंने नाम भी बताये
एक दूसरे को उन सबके
जिन्होंने सीख लिया था
इस बीच तैरना
पार उतरना और किनारे लगना
और दुनिया की सारी समस्यायों के समाधान
सोच लेने के बावजूद
वो नहीं सोच सके एक बच्चे का नाम…

*

समय की यह धार

बड़े श्रम से मोड़ी गयी है
समय की यह धार
लौटा कर लाया गया है
एक बीता हुआ कृत्रिम समय मेरे लिए
जबकि जब वह समय था
बढ़िया था, सुंदर था
उसे लौटाया गया है इस तरह
कि तात्कालिक संकटों के
कारण ढूढ़े जाएँ उसमें
जैसे ढूँढी जाती है
राई के पहाड़ में
गुमी हुई सुई
और जब किया जाता है ऐसा
तब दस उपक्रम किये जाते हैं
असहज, अनैतिक भी
ढूंढने को वह चीज़
जो दरअसल गुमी ही नहीं
गुमा है कुछ और
जिसे ढूँढा नहीं जा रहा
केवल गतिरोध नहीं है कष्ट
इस पूरी प्रक्रिया का
एक क्षद्म संकट से उबरते
निपटते रहने की कोशिश में रहना
दरअसल, अपने जीवन में
बने रहना नहीं होता…

*

रिश्ते

रिश्ते कोई स्वेटर तो होते नहीं
जिन्हे पहन लेना हो
या जिनमे समा जाना हो
जो फिट हो जाएँ बिल्कुल
रिश्ते साड़ी चादर भी नहीं
जिन्हे ओढ़ लिया जाए
लपेट लिया जाए
या सिमट जाया जाए
उन्हीं में
रिश्ते तो महसूसने की चीज़ हैं
पर यही समझा रही थीं
उसे उसकी सब बड़ी समझदार बहनें
रिश्ते महसूसने की नहीं
पहनने की ही चीज़ हैं
जो उन्हें ज़ेवर की तरह पहनती हैं
वो महिलाएं सबसे बुद्धिमती होती हैं…

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