‘गर्मियों की शुरुआत’ – मंगलेश डबराल

पास के पेड़ एकदम ठूँठ हैं
वे हमेशा रहते आए हैं बिना पत्तों के
हरे पेड़ काफी दूर दिखाई देते हैं
जिनकी जड़ें हैं, जिनकी परछाईं हैं
उन्हीं में कोई आँधी अटकी हुई है

गर्मियों की शुरुआत में
हम कुछ दूर जाकर रुक जाते हैं
जो हमें कहना है
उसे कहना बंद कर देते हैं
उम्मीद करते हैं किसी परिचित
चेहरे के लौटने की

स्पर्श बदलने लगते हैं
चिपचिपे अमूर्तनों में
कवियों में होड़ शुरू होती है
जल्दी से अपनी महानता पहचानने की
अखबार छापते हैं, गोलियाँ चलती हैं
दीवार पर प्रकट होती है
एक छिपकली धीरे-धीरे सरकती।