गोरैया

मैं कंटीली झाड़ियों में फंस कर
तड़फने वाली गोरैया हूँ
किसी भी तरफ हिलूं
कांटे चुभेगे मुझे ही
ये आज के कांटे नहीं हैं
पीढ़ियों से मेरे इर्द-गिर्द फैलाई
गुलामी की जंजीरे हैं
आगे कुआं पीछे खाई-से
हमेशा मेरे इर्द-गिर्द
खतरे फुफकारते रहते हैं
अरे हाँ, अपनी ज़िन्दगी को मैंने जिया ही कब?

घर में पुरूषाहंकार एक गाल पर थप्पड़ मारता है
तो गली में वर्ण-अधिपत्य
दूसरे गाल पर
मजूरी के पैसे लेने खेत गई
तो वहां आसामी पसीने के साथ
जब मुझे ही लूटने की ताक में था
मुझे लगा कि मैं बीज बनकर धरती में समा जाऊं
युगों से पढ़ाई से दूर
हॉस्टल की गोद के करीब होने पर
वहां भी
वार्डन की भूखी नज़रें झेल नहीं सकने के कारण
लगा कि दूर फेंक दूँ
बचपन में स्कूल में बिन्दी को लेकर
बड़े होने के बाद जाति को लेकर
सबको मेरे बारे में फुसफुसाते देख कर लगा –
मैं जोर से नाक दबा लूँ
वासना के काम आई मैं
मगर घर की घरनी भी जब बन नहीं सकी मैं
मुझे लगा किसी तालाब में सिर छिपा लूँ

सहन शक्ति के मर जाने पर
घास का तिनका भी शूल बन कर चुभता है
अब मैं और दौड़ नहीं सकती
इन कष्टों की ज्वाला में जिंदगी को धोकर
पलारू-सा खिल जाऊंगी
अड़चनों के जंगल को पार कर
झरने-सी छलांग लगाऊंगी!!

‘पतिव्रत-रिवाज’
इन सब पर वीर्य स्खलन करेंगे हम
पसीने के समूह को बांट कर
काल को धोखा देने वाले दिनों के लिये
विदाई चिट्ठी लिखी जा रही है तो
युगों से हृदय में मथते घाव
गलियों से सर तान कर बढ़ रहे हैं आज
आंसुओं को अलग कर
घावों का विभाजन मत करो तुम!!