गौरव अदीब की नयी कविताएँ

गौरव अदीब की कुछ नयी कविताएँ

1)

टाइम मशीन कविता के लिए:
कई बार तुम्हारी ओर से मैंने ख़ुद को लिखा पत्र
लिखीं कुछ कवितायेँ भी
तुम्हारी कहानी ख़ुद की ज़बानी
सुना ली ख़ुद को
मैंने कागज़ पर लिखा समय
और पलट कर रख दिया उसे
शाम को उससे दिया बालूँगा
क्षितिज पर डूबता सूरज देखना
लाल हो जाता है
अंत तक कुछ बचता है तो वो प्रेम है
समय की मशीन अगर मिली तो
पीछे नही लौटूँगा
भूत में किये गए पापों को
नही मिटा पाऊँगा पाप से
मैं भी देखता हूँ वही सपने जो तुमने देखे
मैं इन्हें अगले जन्म के लिए रखूँगा
मैं तुम्हारे बचपन को नहीं देखना चाहता
और ना ही खरीदना चाहता हूँ
परिचित दुकान से लाल जेली वाली टॉफी
उनमे चिपका रह जायेगा अपराधबोध
मैं अगले जन्म तुम्हें देखूँगा नवजात
बिलकुल अपरिचित जगह से
हम साथ खरीदेंगे टॉफी
जो पहले कभी नही चखी तुमने
इतिहास बदलने को समय ख़राब किये बग़ैर
भविष्य के सुखद सपनों को बुनुंगा
अगर सम्भव हो तो समय की मशीन बनाओ
जिनमें से निकले कुछ नितांत निजी पल
न पीछे जाने की चाह रहे
न आगे जाने की
मैं अपनी सायकिल का नाम समय रखूँगा।

2)

तुम्हारा नाम ज़बान पे आते ही
ज़ेहन में एक तस्वीर उमड़ती है
तस्वीर, पाँव में घुंघरू बाँधे
नन्हीं सी चिड़िया की
फुदकती यहाँ तो कभी वहाँ
बेहद गोल आँखे, छोटी गुड़िया की जैसी
मेरी बहन के पास थी एक वैसी गुड़िया
जिसे लिटाने पर ख़ुद मूँद लेती थी आँखे
मुझे भी गुड़िया पसंद थी
मेरी दो बहनें थी, एक बहन -एक गुड़िया
उसका नाम ज़बान पर आते ही ,छोड़ो भी
गुड़िया अब बड़ी हो गयी है
सुना है पढ़ाने लगी है।।

3)

रसे वाली मछली
पालक की दाल
हलीम
बेसन की रोटी
रसावर
फिरनी
ये कुछ चीज़ें
ताज़ी जितनी अच्छी लगती हैं
उससे ज्यादा अच्छी लगती हैं बासी
इनमे तुम अपना नाम जोड़ लो
बासी तुम में
ज्यादा सोंधापन होता है ।।

4) इस कविता में बहुत मैं है

5)

तुम कहाँ नहीं हो ? सवाल ग़ैर ज़रूरी सा है
लेकिन जवाब  बेहद ज़रूरी है
तुम छुट्टी की सुबह
मुडेर से दूर तक दिखता आसमान हो ,
विस्तार हो क्षितिज तक का
तुम दालान में,  धूप के आगे की छाँव हो
जहाँ पसारे जा सकते हो पाँव देर तक
उमस भरे दिन में नहाने के बाद
बदन को सिहराने वाली हवा का झोंका हो तुम
जो चलता है ठहर के कभी-कभी
अलसायी सी सुबह में
जिस रोज़ सोना एक ज़रूरी काम हो ,
उस दिन तुम, सुबह की बड़े मग वाली चाय हो
जिसे अंत तक पिया जाना ,जागने की पहली शर्त है
तुम सीने सी चिपकी ग़ज़ल की किताब हो
जिसका केवल एक ही शेर पढ़ा जाता हो
और बाकी पूरे वक़्त होती हो उसकी तर्जुमानी
तुम दोपहर की सुस्ती हो , शाम का आलस हो
रात की बेचैनी हो और बेचैनी का सुकून
तुम ख़ामोशी में लिखी गयी नज़्म हो
तुम जोर से लगाया गया ठहाका हो
तुम चादर हो जिसे ओढ़े बग़ैर
सोया नही जाता मुझसे एक भी रात
तुम एक लंबी कविता हो
तुम एक शेर हो , तुम उपन्यास हो
तुम बिना धूप के बनने वाली एक पारदर्शी छाया हो,
तुम दो आँखों में से एक आँख हो
तुम हर उंगली का पहला पोर हो
तुम दो धड़कनों के बीच की जगह हो
जहाँ दिल सुस्ताता है
तुम हथेली पर उभरी नयी लकीर हो
खाये हुए हर दूसरे निवाले में हो
तुम बॉलीवुड की हर पिक्चर में भी हो
तुम पोगो के हर कार्टून में भी हो
तुम हर गाने के बोल में हो
तुम हर किताब का हिस्सा हो जिसे मैं पढ़ता हूँ
मैंने कहा था , सवाल गैरज़रूरी है ।।

6)

एक बूँद गिरने से पहले भाप बन गयी
एक कली खिलने से पहले सूख गई
एक रात चाँद अग़वा कर लिया गया
एक दिन खुशबुओं को नज़रबन्द किया गया
एक दिन हथेलियों को ठण्डा रहने दिया गया
एक दिन होंठों में शहद नहीं भरा गया
एक दिन सपने छुट्टी पर चले गए
एक दिन इंतज़ार की हमजोली हुई
एक दिन रोटियाँ धरी धरी सूख गयीं
एक दिन बातें सब बेमतलब थीं
एक दिन एक दिन की हत्या हुई
एक दिन
एक दिन
एक दिन
तुम्हारे सामने हाँथ बाँधे खड़ा रहा है
एक दिन तुमने बेवज़ह बाल खो दिए ।।

7)

लौट आने की ख़बर
बता देनी चाहिए, लौटने से बहुत पहले
देर से, बहुत देर से बतानी चाहिए
जाने की ख़बर!!