गौरव सक्सेना ‘अदीब’ बतौर स्पेशल एजुकेटर इंटरनेशनल स्कूल में कार्यरत हैं और थिएटर व शायरी में विशेष रुचि रखते हैं। दस वर्षों से विभिन्न विधाओं में लेखन के साथ-साथ हिन्दी में असगर वज़ाहत के चार नाटकों का निर्देशन भी कर चुके हैं। नाट्यकल्प नृत्य समूह के लिए पटकथा लेखन कर चुके गौरव वर्तमान समय में परवाज़ स्टूडियो की स्थापना के बाद विशेष आवश्यकता वाले बच्चों पर आधारित फ़िल्म के निर्माण में व्यस्त हैं। आज पोषम पा पर पढ़िए उनकी कुछ कविताएँ जो वस्तुतः गीत चतुर्वेदी की कविताओं की रिएक्शंस हैं।

1)

वो अक्सर कहती
सबसे प्रिय हैं तुम्हारे हाँथ मुझे
मैं मन ही मन मुस्काता
इन्हीं हाँथों से तो लिखता हूँ कवितायेँ
वो कहती रही और मैं लिखता रहा
यकायक यूँ ही एक रोज़
उसने कहा – जानते हो
क्यों ही प्रिय हैं तुम्हारे हाँथ
मैं मुस्काया और अचरज से
तकता रहा देर तक उसे
वो बोली
तुम्हारे हाँथ पिता के हाँथों से लगते हैं
बिना प्यास के, बहुत देर तक,
लगाये रहती थी होंठ उनके हाँथों से
जब पिता अंजुरी भर पिलाते थे पानी
मैं अब अंजुरी भर पानी पीता हूँ..

2)

रौशनी का पर्दा था
मैंने आवाज़ के झरोखे से
देखा तुम्हे
तुमने चितवन से मौन भेजा
मैं देर तक अनुवाद करता रहा
इस तरह हम होकर नही थे
और होने का प्रमाण देते रहे
मैं अब शब्द से परे
ध्वनि की कविता लिखूँगा
तुम अज्ञात भाषा में अनुवाद करना
हम एक किताब की ज़िल्द हैं
हमारे बीच बहुत सारे पन्ने हैं
लेकिन सब ज़िल्द से शुरू हो
ज़िल्द पर ख़त्म होते हैं
हम पर कोई पेज़ नम्बर नही होगा
हम गणना से परे हैं
हम किताब हैं भी और नही भी..

*गीत की कविता से उधारी के बाद

3)

जब कोई अनकहा सुन लेता हो
उससे झूठ मत बोलना
इससे सुनने की ताकत कम हो जाती है

जब कोई पढ़ लेता हो आंखों को तो
उससे मत छुपाओ आंसुओं को
इससे पढ़ने की ललक कम हो जाती है

जब कोई परछाई की तरह रहता हो साथ
तो उसे ग़लत पता मत देना
इससे मिलन की चाह कम हो जाती है

जब देह के ताप से देता हो कोई ऊर्जा
तो आधे मन से आलिंगन मत करना
इससे रूठ जाते हैं प्रेमी मन!!

4)

तुम मुझे कविताओं जैसी प्रिय हो
तुम कविताओं में रची बसी हो
और कविताएँ तुमसे जन्मती हैं

कभी तुम तक पहुँचता हूँ
कविताओं की चकरीदार गलियों से होता हुआ
कवितायेँ भाई की तरह हाँथ थाम लेती हैं

तुमसे दूर होकर मैं गिरता हूँ
कविताओं की गोद में
कवितायें माँ हो जाती है

हाँ जब सब कुछ होता है
तब भी कविता होती है
और जब कुछ नही होता
तब भी कविता होती है

कविता तुमसे जन्मती है!!

5)

कुछ चीज़ों को ठीक समय पर ही होना चाहिए
प्रणय का निवेदन ठीक तब किया जाए
जब टूटने को हो सब्र का बाँध
शायद सबसे उपयुक्त शब्दावली
तभी ढूँढना संभव होगा
जीवन की सार्थकता
पूँछी जाए अंतिम साँस से ठीक पहले
कुछ चीज़ों को
छोड़ना नही चाहिए बाद के लिए
घट जाती है उनकी तासीर
रखकर छोड़ देना गर्म चाय कभी,
करके देखना, क्या ही बुरा है इसमें
मैं जबकि थक चुका हूँ
लेकिन
मैं लिख देना चाहता हूँ
आज के पूरे उत्साह को
शब्द शब्द करके सारा
जिनमे हो पल पल का लेखा जोखा
मैं तुम्हारी तरह “थैंक यू ” नही लिखूंगा
न मेरी आदत है
और
न मैं समझता हूँ इसे ज़रूरी
चूँकि मैं जानता हूँ ठंडी चाय बेस्वाद होती है
मैं ठीक इसी पल
उत्साह का पार्सल तुम्हे भेज रहा हूँ
खोलना इसे आहिस्ते से
रात भेजी है मैंने
तुम साथ न होती तो
दिन न बचा पाता
तुम न होती तो
रात न भेज पाता

तुम न होती तो

तुम न होती तो

तुम न होती तो

मैं इसे यूँही छोड़ देना चाहता हूँ
कुछ चीज़ें वक़्त पर हो जाएँ ज़रूरी है
पूरी हों
ज़रूरी नही
अधूरेपन में विस्तार की ज्यादा सम्भावनाएं होती हैं
अनकहे में होता है ज्यादा अर्थ!!

6)

सुनो अमृता !!
बहुत प्रेम में बिछोह का डर
चाँद की तरह हर रात आता है
कभी थोड़ा कम
कभी थोड़ा ज्यादा
घटता बढ़ता रहता है ये डर
माँ के पास लेटा बच्चा
जब देखता है बुरा सपना
पूरी ताकत से
भर लेता है माँ को आलिंगन में
प्रेम में
बिछोह के भय से
उपजता है और ढेर सारा प्रेम
और फिर उसके बाद ढेर सारा डर
जैसे होते रहते हैं दिन और रात
ये क्रम चलता रहता है
सूरज कभी कम ज़्यादा नही होता
सूरज किसी से रौशनी नही लेता
हमारा प्रेम सूरज है !!

सुनो अमृता
कितनी ही बार
तुम्हारा मन पढ़ लेता हूँ मैं
गा देता हूँ वही गाना जो तुम गुनगुना रही होती हो
बिना पूछे बढ़ा देता हूँ तुम्हारी ओर चाय का प्याला
या पहनता हूँ वही रंग जो तुमने सोंचा होता है
ठीक उसी वक़्त खोलता हूँ खिड़की
जब तुम गुजर रही होती हो मेरी गली से
कई बार मैं ख़ुद भी डर जाता हूँ अमृता
ये निजता का हनन है
सेंधमारी है ये
तुम्हे इस चोरी से डर नही लगता
कभी मेरा भी ताला तोड़ो
कभी बढ़ा दो मेरी ओर एक प्याला चाय
हर बार मैं कहूंगा तो नही अमृता
मैं ज़रूरत भर उर्दू सीख लेता हूँ
तुम ज़रूरत भर ख़ामोशी पढ़ना सीख लो..


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

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