घृणा तुम्हें मार सकती है

चाहे संकीर्ण कहो या पूर्वाग्रही
मैं जिस टीस को बरसों बरस
सहता रहा हूँ
अपनी त्वचा पर
सुई की चुभन जैसे,
उसका स्वाद एक बार चखकर देखो
हिल जायेगा पाँव तले ज़मीन का टुकड़ा।

मेरे और तुम्हारे बीच एक रेतीला ढूह है
जो किसी अंधड़ का इन्तजार करने से पहले
किसी भी वक्त फट सकता है
जिसके गर्भ से निकलेंगे
घृणा में लिपटे कुटिल शब्द
जिन्हें जलना होगा
दहकती भट्ठी में
रोटी की महक में बदलने के लिए।

रोटी की महक
जानती है आग का स्वाद
और,
पहुँचती है नासिका रन्ध्र तक
हड्डियों के रस में डूब कर।

यदि, तुम्हें पहुँचना है
इस महक तक
अपने कापुरुष से कहो
भय छोड़कर बाहर आये
जैसे छत पर आती है धूप।

घृणा तुम्हें मार सकती है
तोड़ सकती है
पर अपने ही दायरे में
जिन्दा नहीं रख सकती
ताजा हवा देकर
और, नहीं सुना सकती
प्रेम कविता
मौसम के रंगीन पंखों पर बैठकर!