गुलज़ार साहब की नज़्मों की नयी किताब ‘पाजी नज़्में’ लगभग एक महीना पहले आयी है, उसी किताब से पाँच खूबसूरत नज्में यहाँ प्रस्तुत हैं। पढ़ते समय यह कल्पना कि इन नज़्मों का पाठ गुलज़ार साहब ही कर रहे हैं, दिल को सुकून देती है.. पढ़ कर देखिए..

कहा गया है कैबिनेट के सब वज़ीर

कहा गया है कैबिनेट के सब वज़ीर अपने-अपने राज़ीनामे भेज दें
वज़ारतें बदल के सबको, फिर से बाँटी जाएँगी।

हमारी दादी भी लिहाफ़ का ग़िलाफ़
जब भी मैला होता था,
सारे टाँके खोलकर,
उलट के कपड़ा, फिर से उसको सीती थीं।


एक सुबह जब इश्क़ हुआ था!

चार बजे थे सुबह के, जब इश्क़ हुआ था
एक पहाड़ से उतर रहे थे, लौट रहे थे शूटिंग से
कोहरा था, धुँधली-धुँधली सी रौशनी थी
कार की दोनों बत्तियाँ आँखें मल-मल के राह ढूँढ रही थीं

नींद में तुम कन्धे से फिसल के
बाँहों में जब भरने लगी थीं
मैंने अपने होंट तुम्हारे कान पे रखके फूँका था
“ऐ तू माला खूब आवड़ते…!”
नींद में भी तुम थोड़ा-सा मुस्काई थीं

वक़्त इबादत का था वो,
सच कहने की बेला थी
चार बजे के आसपास का वक़्त था वो
एक सुबह जब इश्क़ हुआ था!


इक नज़्म मेरी चोरी कर ली कल रात किसी ने!

इक नज़्म मेरी चोरी कर ली कल रात किसी ने
यहीं पड़ी थी बालकनी में
गोल तपाई के ऊपर थी
व्हिस्की वाले ग्लास के नीचे रखी थी
शाम से बैठा,
नज़्म के हल्के-हल्के सिप मैं घोल रहा था होंठों में
शायद कोई फ़ोन आया था…
अन्दर जाके, लौटा तो फिर नज़्म वहाँ से ग़ायब थी
अब्र के ऊपर-नीचे देखा
सुर्ख़ शफ़क़ की जेब टटोली
झाँक के देखा पार उफ़क़ के
कहीं नज़र न आई, फिर वो नज़्म मुझे…

आधी रात आवाज़ सुनी, तो उठ के देखा
टाँग पे टाँग रखे, आकाश में
चाँद तरन्नुम में पढ़-पढ़ के
दुनिया-भर को अपनी कह के नज़्म सुनाने बैठा था!


डिक्लेरेशन

मैं जब लौटा वतन अपने…
यहाँ कस्टम के काउंटर पर खड़े सरकारी अफ़सर ने
मेरा सामान जब खोला…
मेरे कपड़े टटोले, मुझसे पूछा भी,
“कोई शै ग़ैरमुल्की है?
जिसका लाना ग़ैरवाजिब हो?
‘बयाननामे’ पे लिख के दस्तख़त कर दो!”

मैं सब कुछ ला नहीं सकता था तेरे मुल्क से लेकिन
मैं तेरी आरज़ू को रोक न पाया, चली आई
मुनासिब तो नहीं फिर भी…
‘बयाननामे’ पे तेरा नाम लिख के, कर दिये हैं दस्तख़त मैंने!


चिपचे दूध से नहलाते हैं आँगन में खड़ा कर के तुम्हें

चिपचे दूध से नहलाते हैं आँगन में खड़ा कर के तुम्हें
शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, न जाने क्या क्या
घोल के सर पे लँढाते हैं गिलसियाँ भर के…

औरतें गाती हैं जब तीवर सुरों में मिल कर
पाँव पर पाँव लगाये खड़े रहते हो इक पथराई-सी मुस्कान लिये
बुत नहीं हो तो, परेशानी तो होती होगी!

जब धुआँ देता, लगाता पुजारी
घी जलाता है कई तरह के छोंके देकर
इक ज़रा छींक ही दो तुम,
तो यक़ीं आये कि सब देख रहे हो!

■■■

नोट: इस किताब को खरीदने के लिए ‘पाजी नज्में’ पर या नीचे दी गयी इमेज पर क्लिक करें!


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

1 Comment

  • Digital Marketing Agency Delhi · March 9, 2018 at 2:30 pm

    I am extraordinarily affected beside your writing talents, Thanks for this nice share.

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