है रात तेरी सूरत यही

है रात की सूरत यही जो तुझे इधर उधर ढूँढती,
मैं रूठती मनाती खुद को ही,
कभी उल्ट पलट कोरे काग़ज़ को तकती,
कभी कलम को तेरी लिखावट पर घिसती,

है रात की सूरत यही जो तुझे एक पल निहारने को तरसती,
मैं रोकती जगाती खुद को ही,
कभी चादर में छिपकर आंसूओं को पोंछती,
कभी तकिये में सिर दबाए ज़ोर से चीखती,

है रात की सूरत यही जो तुझे तेरी ही बातों से परखती,
मैं बोलती समझाती ख़ुद को ही,
कभी टहलकर आगे पीछे अपनी गलतियां टटोलती,
कभी खुद ही तेरी दोगली बातों में फिर उलझती,

है रात की सूरत यही जो तुझे छत पर आंखे गड़ाए सोचती,
मैं कोसती गरियाती ख़ुद को ही ,
कभी यादों को तेरी लिखती मिटाती,
कभी सूरत तेरी मेरी आँखों में धुंधला जाती,

है हर रात तेरी सूरत यही,

अब बेवफ़ा इस मोहब्बत की मुझे ज़रूरत नहीं,
खुद को उड़ने बहकने नहीं देती,
अब रात मुझे सहमने नहीं देती,
रात अब ठहरती नहीं मेरी आँखों में,
मैं रात को सिहरने नहीं देती,
है रात की सूरत अब ऐसी नहीं,
रात अब मुझे अपनी गोदी में सुला लेती है
अब जागने नहीं देती!