यह जानना एक आम जिज्ञासा है कि एक कविता लिखते समय किसी कवि के मन में क्या चल रहा होता है! इसके बावजूद कि वह कविता हमारे खुद के मन को एक दर्पण दिखाती हो, हम यह मालूम करना चाहते हैं कि जो कवि ने सोचा और लिख दिया, वह किस प्रक्रिया से होकर आया है। विचार का प्रारम्भ उसकी एक कविता में हो चुकी परिणति से ज्यादा उत्सुक कर देता है, और यही उत्सुकता हमें ले जाती है उस कवि के एक साधारण इंसान के रूप में जिए गए जीवन की ओर। जैसे-जैसे जीवन घटनाएँ हमारी आँखों के सामने खुलती हैं, कवि की कविताओं में नए-नए अक्स उभरने लगते हैं। शब्दों के नए अर्थ निकलने लगते हैं, ऐसे अर्थ जिनके बारे में पहले सोचना भी लगभग नामुमकिन था।

यद्यपि किसी मुकम्मल कवि के सम्पूर्ण कार्य को पढ़ लेना और आत्मकथा, जीवनी, व लेखों के ज़रिये उसके जीवन की सारी घटनाओं में से होकर गुज़र जाना बड़ा मुश्किल है, फिर भी कोशिश तो हम जारी रखते ही हैं।

आज यहाँ हरिवंशराय बच्चन की पहली और अन्तिम कविता (उनकी पहली और अन्तिम किताबों के आधार पर) प्रस्तुत की गयी हैं। जहाँ पहली कविता ‘स्वीकृत’ में प्रेम अपना एक अनपेक्षित प्रथम परिचय देता है तो वही अन्तिम कविता ‘मौन और शब्द’ में एक विराम, एक थकान और एक जिज्ञासा है, जिज्ञासा अपने ही मूल्याङ्कन की। पढ़िए और साझा कीजिए कि आप उनकी इन कविताओं के ज़रिये उनके जीवन चक्र को किस वृत्त में घिरा पाते हैं..।

स्वीकृत (‘तेरा हार’ से)

घर से यह सोच उठी थी
उपहार उन्हें मैं दूँगी,
करके प्रसन्न मन उनका
उनकी शुभ आशिष लूँगी ।

पर जब उनकी वह प्रतिभा
नयनों से देखी जाकर,
तब छिपा लिया अञ्चल में
उपहार हार सकुचा कर ।

मैले कपड़ों के भीतर
तण्डुल जिसने पहचाने,
वह हार छिपाया मेरा
रहता कब तक अनजाने?

मैं लज्जित मूक खड़ी थी,
प्रभु ने मुस्करा बुलाया,
फिर खड़े सामने मेरे
होकर निज शीश झुकाया!

मौन और शब्द (‘जाल समेटा’ से)

एक दिन मैंने
मौन में शब्द को धँसाया था
और एक गहरी पीड़ा,
एक गहरे आनंद में,
सन्निपात-ग्रस्त सा,
विवश कुछ बोला था;
सुना, मेरा वह बोलना
दुनिया में काव्य कहलाया था।

आज शब्द में मौन को धँसाता हूँ,
अब न पीड़ा है न आनंद है
विस्मरण के सिन्धु में
डूबता सा जाता हूँ,
देखूँ,
तह तक
पहुँचने तक,
यदि पहुँचता भी हूँ,
क्या पाता हूँ।