किसी हिन्दी पाठक के पढ़ने की शुरुआत कहीं से भी हुई हो, जब तक अन्य उम्दा लेखकों से साक्षात्कार नहीं हो जाता या फिर खुद के फेवरेट्स नहीं बन जाते, किसी भी नए पाठक को अपनी मंज़िल पर वही शख्स खड़ा दिखाई देता है, जिसे विश्व साहित्य ‘प्रेमचंद’ के नाम से जानता है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। ‘राग दरबारी’ से शुरुआत हुई, ‘चित्रलेखा’ ने विस्मित किया और ‘गुनाहों का देवता’ ने सम्मोहित कर जैसे किसी जाल में ही बाँध दिया हो। फिर भी कुछ कमी सी लगती थी, और वह इसलिए नहीं कि जो पढ़ा, वह अच्छा नहीं था या अपेक्षाओं से कम लगा, किंतु केवल इसलिए क्योंकि मन के कोनों से कोई रह-रहकर चिल्लाता था- ‘प्रेमचंद को कब पढ़ोगे?’ और यह आवाज़ एक लंबे समय (समय लंबा क्यों हुआ, इसका कारण अज्ञात ही रहा) तक ज़हन पर हथौड़े बरसाती रही और फिर एक दिन आया जब यूँ ही कहीं सामने ‘निर्मला’ दिखी।

आखिरकार जब निर्मला पढ़नी शुरू की तो भी पूर्वाग्रहों से ग्रस्त था और दिलो-दिमाग में ‘गबन’ और ‘गोदान’ गूँजा करते थे। कोई अन्दाजा ही नहीं था कि निर्मला के उस पतले से पुलिंदे में से मर्म और करुणा से भरी एक नदी बह निकलेगी। जीवन के एक के बाद एक आघात सहती, विडंबनाओं से जूझती, फिर भी आगे बढ़ती निर्मला की कहानी। प्रेम की परतों से लदी सुधा को तो जानता था लेकिन ज़िन्दगी के हाथों दी गयी बेबसी को, जिसकी तरफ इंसान एक अबोध शिशु की तरह केवल ताक सकता है, पहली बार देखा था, पढ़ा था।

जीवन, तुमसे ज़्यादा असार भी दुनिया में कोई वस्तु है?

कौन है ऐसा इंसान जिसने यह सवाल कभी ना कभी खुद से न पूछा हो? यह पंक्ति मेरे लिए उस दिन का हासिल थी और आज भी साथ है। फिर गोदान पढ़ी, होरी और धनिया जैसे अमर पात्र मिले, जिनकी परतें जितनी बार खोली जाती हैं, उतनी ही बार गाँव के किसानों के बारें में कुछ नया पता चाहे न भी लगे, खुद अपने दायित्व का नया बोध सामने ज़रूर आ खड़ा होता है। क्यों था होरी इतना लाचार? क्यों थी धनिया उतनी ही आक्रामक? और क्यों धनिया की आक्रामकता और गोबर की आधुनिक सोच मिलकर भी होरी की नैय्या पार नहीं लगा पाए?

ऐसे ही कुछ सवालों से हमेशा खुद को घिरा पाता हूँ, जब भी कभी हाथों में प्रेमचंद का लिखा कोई भी उपन्यास या कहानी होती है। ज़्यादा की चाह में अपना सब कुछ गवाँकर अंत में अपना जीवन दूसरों के लिए समर्पित करने वाली ‘सेवासदन’ की सुमन हो, या ‘प्रेमाश्रम’ के प्रेमशंकर और ज्ञानशंकर, दो भाइयों के रूप में दो विपरीत जीवन आदर्शों की एक तस्वीर। चाहे ‘रंगभूमि’ का सूरदास भिखारी हो, जो ज़मींदारों और कारोबारियों के बीच भी सबसे अमीर, सबसे धनवान चरित्र रखता है या फिर ‘ठाकुर का कुआँ’ की गंगी जिसका सारा मनोबल, सारा विद्रोह घुटने टेक देता है घड़े की केवल एक छपाक पर। ‘पूस की रात’ के हल्‍कू का खेतों के उजड़ने पर भी यह कहना- “रात की ठंड में यहाँ सोना तो न पड़ेगा” अपने आप में प्रेमचंद की सामाजिक और व्यावहारिक समझ का नमूना हैं।

इन सभी पात्रों की जो सहज संरचना प्रेमचंद करते आए हैं, वो हिन्दी साहित्य में आसानी से नहीं मिलती। स्वाभाविक है किसी लेखक में समाज के विभिन्न पहलुओं को लेकर इतनी जागरूकता, संवेदनशीलता और पकड़ बिना उस समाज में जिए या उसे जाने बिना नहीं आ सकती। प्रेमचंद के जीवन के बारे में जो कुछ भी फुटकल में पढ़ा था, उससे यह बात प्रमाणित भी होती है। मन में विचार आया उनकी जीवनी पढ़ने का। देखा तो जाए एक ऐसे लेखक के जीवन में झाँककर जिसने हज़ारों-लाखों पाठकों के जीवन संघर्षों और विचारों को उनसे बिना मिले, बिना बात किए हूबहू काग़ज़ पर उतार दिया। ज्ञात हुआ कि प्रेमचंद की जीवनी, उनके ही पुत्र ‘अमृतराय’ ने ‘प्रेमचंद – कलम का सिपाही’ शीर्षक से लिखी थी। बेचैन था इस किताब को अपने हाथों में लेने के लिए, लेकिन दुर्भाग्य कि यह किताब कुछ दशकों में ही दुर्लभ हो चली है। प्रकाशनों से लेकर अधिकतर सभी ई-कॉमर्स साइट्स छान मारी, लेकिन इस किताब के दर्शन नहीं हुए। ‘दुर्गेश नंदिनी’ की एक हार्डकवर कुछ साइट्स पर उपलब्ध है लेकिन कैटेगरी से प्रतीत होता है कि वह एक आलोचना है जो शायद मूल पुस्तक पर लिखी गयी हो (यह केवल मेरा अनुमान है)।

मेरे लिए यह बड़े आश्चर्य की बात रही कि प्रेमचंद की जीवनी जो स्वयं उनके पुत्र अमृतराय ने लिखी है, 1963 की साहित्य अकादमी पुरूस्कार की विजेता है और मेरे हिन्दी के एक नियमित पाठक ना होने के बावजूद जिसका ज़िक्र मेरे सामने यदा-कदा आता रहा है, वह किताब इतना ढूँढने के बावजूद नहीं मिल पाई। इस किताब का दुर्लभ हो जाना केवल मेरा या इस किताब को पढ़ने के इच्छुक लोगों का ही नहीं, हिन्दी का भी दुर्भाग्य है। मैं यहाँ इस पोस्ट के माध्यम से सभी बड़े प्रकाशनों और संपादकों से निवेदन करना चाहूँगा कि आपके अथक प्रयासों में एक प्रयास यह भी शामिल हो, जिससे ना जाने कितने लोगों को हिन्दी के एक महान साहित्यकार के जीवन के कुछ अंश जानने व उनसे प्रेरणा लेने का मौका मिल सकेगा।

मानता हूँ गूगले पर सर्च करना भी एक कला है और सही वक़्त पर अपनी ज़रूरत या पसंद की चीज़ ढूँढ लेना भी। संभव है मैं दोनों में खराब हूँ लेकिन अगर इस पोस्ट को पढ़कर कोई मुझमें लाख ग़लतियाँ गिनाकर भी यह किताब या इस किताब का पता मुझे उपहार में दे दे तो मैं उसे अपने जीवन का सबसे अनमोल तोहफा समझूंगा.. और अगर कभी किसी पुस्तक मेले में किसी स्टाल पर, एक चमचमाते कवर के साथ इसकी एक इमारत खड़ी दिख जाए तो कहना ही क्या?!

कुछ और दिनों की मशक्कत के बाद एक ऑनलाइन लाइब्ररी में यह किताब मिली ज़रूर है लेकिन मैं उत्सुक हूँ अपने बिस्तर पर औंधा लेटकर इस किताब के पन्ने बारी-बारी से पलटने के लिए।

हिन्दी दिवस की ढेरों शुभकामनाएँ!


Puneet Kusum

नाम पुनीत कुसुम है, पेशे से सॉफ्टवेर इंजीनियर हूँ (जल्दी ही यह बताना बंद करना चाहूँगा) और स्वभाव से एक सामान्य इंसान जो भीतर के द्वंद और अंतर्विरोधों से पीछा छुड़ाने का माध्यम कविताओं को मान बैठा है। हिन्दी में पोस्ट ग्रॅजुयेशन ज़ारी है और अपनी कविताओं से लोगों तक पहुँचने के प्रयास भी। पढ़ने का शौक है और पढ़ते हुए जो रत्न मिल जाते हैं, उनको दुनिया तक पहुँचाने की ललक, और इसीलिए पोषम पा। इसके अलावा किसी विशिष्ट परिचय पर अधिकार नहीं है, जैसे होता जाएगा, बताते जाएँगे। :)

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