होठों से आत्मा तक

प्रेम में चूम लेती थी
आँखों को
कभी माथे को
लेकिन आत्मा को चूमना
प्रेम में मृत्यु का अभ्यास करना हैं

कोहरे से भरी शाम में
उदास एकांत से ढकी हुई आत्मा
शब्द दर शब्द बहती रही
चूमना बाकी था एक-दूसरे के होंठ
बस क्षणभर की दूरी थी दोनों के बीच
अंतराल के मध्य से आवाज आई
पाँच साल पहले चूम लिए थे मेरे होंठ
किसी आवारा लड़के ने
प्रारम्भ से अंत तक
आखिर होंठों को आत्मा तक जाना होता है।

प्रेम ने इस तरह थामे मेरे हाथ
गिरने के भय से बचा लिया हर बार
जैसे कोई बच्चा माटी में गिरा
धूल से लिपटा,
मुस्कराते होठ लेकर खड़ा हुआ

प्रेम मुस्कराहट लेकर आता है
चला जाता है
आत्मा में धूल और धुँआ भरकर..