आज या कल?
सत्य वह है जो आज है?
या वह जो कल था?
सत्य वह भी हो सकता है
जो कल होगा
बस उसका आभास ही न हो पाया हो
बीते कल के बिखरे परखच्चे जोड़
एक ‘आज’ खड़ा करने में..

‘कल’ गिने नहीं जा सकते
पहला ‘कल’ क्या वह होगा जब आँखों ने
गर्भ से बाहर की दुनिया में झाँका होगा?
लेकिन फिर उससे पहले के लगभग दो सौ सत्तर कलों का क्या
जो माँ के होठों पर मुस्कान और देह पर साँप की तरह लोटे होंगे
कभी दर्द में, कभी अधीरता में
कभी प्रतीक्षा में
या अगर मान लें कि पहला कल वह दिन था
जब दो देह मिलकर अलग न हो पायीं
एक का दूसरे में कुछ छूट गया
तो फिर उन कलों का क्या जब इस मिलन की नींव रखी जा रही थी?
उन दिनों का सूरज एक सेकण्ड भी जल्दी या देरी से उगा होता
तो शायद सब ‘कल’ ताश की इमारत की तरह ढह जाते
और ‘आज’ या तो होता ही नहीं
या एक जिद्दी पत्ते सा खड़ा होता
अर्थहीन..

‘कल’ गिने, मापे नहीं जा सकते
‘आज’ कलों से बने एक अनंत से आया है
और एक अनंत तक ही जायेगा
पूरा सत्य न वह है जो आज है
न वह जो कल था
और न वह जो कल होगा
सत्य आज और कल के बीच की उस रिक्तता में कहीं है
जो किसी को नहीं दिखती
जिसमें मैं और तुम मिलते हैं
सत्य वो पल हैं जिनमें
तुम में भूल जाती हूँ
अपना कल, आज और कल
सत्य वो क्षण हैं जिनमें
समय ही नहीं होता
होते हो तो बस तुम
मुस्कुराते
विश्वास दिलाते
कि हम भी आज की तरह एक अनंत से आए हैं
और एक
अनंत तक जायेंगे..

 

चित्र श्रेय: मेरे दो दोस्त