अमृता-इमरोज़ का नाम आते ही या तो प्रेम-तिकोनों के कोण नपने लगते हैं या फिर एक में खुद को भुला चुका कोई दूसरा ‘एक’ याद आने लगता है। दो पर एक की छाया हमेशा रहती है। लेकिन किताब ‘सात सवाल’ के विभिन्न साक्षात्कारों में से, अमृता द्वारा लिया गया इमरोज़ का यह साक्षात्कार उन दोनों को एक-एक करके दिखाता है, ख़ास तौर से इमरोज़ को। ज़िन्दगी में कला की अहमियत और धर्म का हस्तक्षेप दोनों पर अमृता के कुछ सवाल और इमरोज़ के वैसी ही तासीर वाले जवाब, जिस तासीर के लिए उनका प्रेम जाना जाता है, यहाँ प्रस्तुत हैं। – पोषम पा

‘इमरोज़ से सात सवाल’

१. ज़िन्दगी और कला आप दो अलग-अलग हक़ीक़तें समझते हैं या एक?
इमरोज़: मेरी नज़र में- आज की मिट्टी में चिंतन के बीज डालकर, उसे कल के सूरज की धूप लगवा सकना- कला है। दूसरे लफ़्ज़ों में ज़िन्दगी एक बिंदु है, और कला उस बिंदु का विस्तार। यह सवाल ही पैदा नहीं होता कि ज़िन्दगी और कला दो अलग-अलग हक़ीक़तें होती हैं। ज़िन्दगी एक धरती है और कला धरती की उर्वरता। यह भी कह सकता हूँ कि ज़िन्दगी पानी है, और कला उसकी रवानी, उसका प्रवाह। हमारे प्राचीन दर्शन के अनुसार जो शिव-शक्ति की कल्पना है, वही मेरी नज़र में ज़िन्दगी और कला की कल्पना है।

ज़िन्दगी आँख और कला उसकी नज़र और नुक़्ता-नज़र। मैं तो इन्सान की जात भी उसके कर्म और कसब के मुताबिक़ समझता हूँ। मेरी नज़र में एक चित्रकार की जात उसके रंग होती है। एक शायर या अदीब की जात उसके अक्षर और एक संगीतकार की जात उसके स्वर।

इस तरह अगर हर व्यक्ति का कसब उसकी जात हो जाए, तो कसब का ईमान उसका मजहब हो जाएगा।

२. कला और क्राफ्ट की तशरीह करेंगे?
इमरोज़: मेरी नज़र में- अहसास की अमीरी वह दूध है, जिसमें सिर्फ तख़य्युल का जामन लगता है। इसी तख़य्युल का नाम कला है। और उसे बिलोने का कर्म एक क्राफ्ट है। बड़ा अहम कर्म, लेकिन कला के जामन के बिना अर्थहीन। कई प्राचीन चित्र ऐसे हैं, जिन पर किसी मुग़ल बादशाह का नाम भी लिखा जा सकता है, किसी बहादुर राजपूत का भी, और किसी जाहो-जलाल वाले गुरु पीर का भी। इसीलिए कि चित्रकारों ने उन चित्रों में तख़य्युल का चित्रण नहीं किया, सिर्फ़ श्रद्धा का शृंगार किया है। ऐसे चित्र वक़्त के दस्तावेज़ भी नहीं बनते।

३. कला में अचेत आरज़ू और चेतन जतन की क्या अहमियत है?
इमरोज़: अचेत आरज़ू एक बीज है। और मन की मिट्टी की गुड़ाई करना, उस पर सुहागा फेरना, उसमें खाद डालना, और बीज को बीजने के बाद उसे ठीक समय पर पानी देना, धूप दिलाना, फिर उस पौधे की छंटनी करना, और आस-पास उगी हुई खरपतवार को निकालना- चेतन जतन है।

४. ज़िन्दगी का कोई ऐसा हादसा बताएंगे, जिसने धर्म और समाज की या वक़्त के इंसाफ़ की स्थापित कीमतों के सामने, पहली बार कोई सवालिया निशान लगा दिया हो?
इमरोज़: मैं तब करीब ग्यारह बरस का था। दादा-दादी जीते थे। उनके पाँच बेटों में से सिर्फ़ सबसे बड़ा ब्याहा हुआ था, मेरा बाप, और सब क्वारे थे। ज़मीन थोड़ी थी, जिससे दुक्खम-सुक्खम सबका गुज़ारा कठिनाई से ही हो सकता था। ब्याहे हुए लड़के का भार, औरों को रड़कने लगा, तो दादी ने, माल-डंगर वाले अहाते में एक कोठरी डलवा कर, बड़े बेटे को उसके टब्बर के साथ अलग कर दिया।

घर में और अहाते में सिर्फ़ चार कदम की दूरी थी, वैसे दोनों आमने-सामने थे। जब तक मेरी माँ जीवित रही, दोनों घरों के बीच का यह थोड़ा-सा फ़ासला जैसे कोसों का बना रहा। पर माँ मर गई, और मेरी छोटी बहन जब कोई नौ बरस की थी, चूल्हे पर कच्ची-पक्की रोटियां थापने लगी थी, तो दादी को बे-माँ के इन बालकों पर ममता आ गई, फिर वह कभी आते जाते बालक को बुलाकर रोटी का टुकड़ा देने लगीं। दादा भी बालकों को लिहाफ़ में बिठा कर पुचकारने लगे।

मेरे क्वारे चाचाओं में से बड़ा चाचा सुन्दर ‘नम्बरदार’ हो गया था, और छोटे चाचा खेत जोतते थे। हमारे गाँव में जो आदमी ढंग से खेतों का काम नहीं करता, लेकिन ऊपर के काम करता है, उसे सब ‘नम्बरदार’ कहने लगते हैं। सो मेरा यह नम्बरदार चाचा बस ‘सानगी’ बजाता था।

और फिर ‘मेरी लगी किसी ने न देखी’ वाली बात हो गई। ‘सानगी’ वाले चाचा को गाँव के करालों की बेटी बन्सो से इश्क़ हो गया।

मुझे याद है- बन्सो के घर में कोई नया कमरा बनाया जा रहा था, जहाँ घर वाले दिन-भर गारा बनाते और ईंटें ढोते थे, और मेरा चाचा भी ‘सानगी’ को भुलाकर, बन्सो के घर पर गारा बनाने बैठ गया।

यह ‘हीर निमाणी ईंटें ढोवे और रांझा ढोवे गारा’ वाली कोठरी नहीं बन रही थी , यह तो सयालों की भैंसें चराने वाली हालत थी।

बन्सो ने अपनी माँ की चोरी से सुन्दर चाचा के लिए कभी चूरी कूटी होगी या नहीं, मैं नहीं जानता। मुझे भी होनी की खबर तब हुई, जब सारे गाँव को हुई कि एक रात घर का दरवाजा बन्द करने के लिए बन्सो बाहरी दहलीज़ के पास आयी तो दहलीज़ को लांघकर बाहर ही आ गई, भीतर घर की और नहीं लौटी।

और अगले सवेरे- गाँव में न बन्सो थी, न सुन्दर चाचा।

बन्सो के घर के लोग जट्ट नहीं थे, कराल थे, (जिन्हें शहरों में लोग अहलुवालिया कहते हैं) इसलिए घर को जो आग लगी थी उसका धुंआ अंदर ही बन्द करके, मुंह सिये बन्सो की तलाश में निकल गए।

हमारा यह गाँव चक नम्बर छत्तीस, लायलपुर से बारह कोस पर था। बन्सो के घर के लोग सीधे लायलपुर गए। वहां उन भटकते हुए लोगों को एक टैक्सी वाले ने खबर दी कि वह दोनों प्रेमियों को लायलपुर के दूसरे छोर पर बसे जड़ांवाला के निकट एक गाँव में उतार कर आया था।

सुराग़ मिल गया, तो प्रेमी भी मिल गए।

बन्सो के घर वालों ने तब भी मुंह नहीं खोला, लेकिन लड़की को बांधकर घर ले आए, और उसे पीछे वाली कोठरी में डाल दिया। सुन्दर से उन्होंने कुछ नहीं कहा, नहीं तो जाने गर्म ताव कइयों से सिर उतर जाते।

लेकिन टूटती को जग ने जान लिया था, इसलिए बन्सो के घर वालों ने एक दिन बन्सो को लायलपुर ले जाकर किसी दुहेजू बुड्ढे के पल्ले बाँध दिया।

भट्टी पर कुछ दिन चर्चा पकती रही, लेकिन चिंगारियां दोनों पक्षों में से किसी के कपड़ों पर भी नहीं पड़ीं।

सिर्फ़ कुछ चिंगारियां थीं जो गाँव के लौंडे-लारों ने चुन ली थीं, और वह कभी-कभी उनके होठों पर जल उठती थीं।

यह भी कह सकता हूँ कि वह लौंडे-लारे छोटे-छोटे किस्सागो थे, जिन्होंने बन्सो और सुन्दर को लेकर कुछ तुकें जोड़ ली थीं, लेकिन जब वह अकेले-दुकेले होते थे, तब ही मुंह खोलते थे, गाँव में किसी के सामने मुंह से बात नहीं निकालते थे।

मुझे सिर्फ़ एक ही बोल याद है, जो आपस में हंसी-मजाक करते हुए वह लड़के गाया करते थे- ‘मुझे सानगी बना ले सुन्दर, कंधे से तेरे बजती रहूँ…’

और एक और समय की बात याद है, जब गाँव में हीर गाते हुए चेतु ने एक दिन खुद ही हीर की कलियों में एक कली जोड़ दी थी- ‘डोली चढ़दियां बन्सो ने चीक मारी, मैनूं लै चल्ले सुंदरा लै चल्लै वे… तेरी भरी जवानी दा रब्ब राखा, असि बुड्ढे दे वस्स विच पै चल्ले वे…’

और फिर एक दिन अचानक बाज़ टूट पड़े।

किसी होनी का वहम-गुमान भी नहीं था। गाँव के नम्बरदार से पानी के कारण लगती आ रही थी, लेकिन बात कहा-सुनी तक ही होती थी, कभी किसी ने दूसरे पक्ष को काटने-मारने की बात मुंह से नहीं निकाली थी। लेकिन एक शाम को नम्बरदार के दोनों कड़ियल जवान भानजे बरछियां लेकर चाचाओं के खेत में पहुँच गए। एक ललकार मारी और चाचाओं पर टूट पड़े।

उस समय खेत में सिर्फ़ मेरा दादा था, और एक चाचा। वह सानगी वाला सुन्दर चाचा नहीं था। दादा ने अपनी लाठी से बरछी का वार रोक लिया। लेकिन चाचा के सिर में बरछी लग गई। उस समय चाचा ने एक बरछी वाले को कमर से पकड़ कर पटख दिया और उसी के हाथ की बरछी छीनकर उसके पेट में घोंप दी। दादा गदके का खिलाड़ी था, इसलिए बरछियों के वार रोकता रहा। दूसरे बरछी वाले को भी दादा और चाचा ने गिरा कर उसकी बरछी उसी के पेट में घोंप दी।

मिनटों में यह दो क़तल हो गए, तो गाँव पर थाना चढ़ आया। नम्बरदार का खाता-पीता घर था, इसलिए मेरे दादा, तीनों चाचा और मेरा बाप, सब बाँध लिए गए। मुकदमा चला। मेरा बाप, सुन्दर चाचा और छोटा चाचा मौके पर नहीं थे, इसलिए तीनों बरी हो गए, लेकिन दादा को और एक चाचा को फांसी की सज़ा सुना दी गई।

अपील की गई तो चाचा की फांसी की सज़ा काले पानी की हो गई, और दादा की मुलतान जेल में चौदह बरस की।

गाँव में बुझी हुई आग फिर सुलगने लगी। लोग अंदाज़ा लगाते थे कि करालों ने नम्बरदार को पैसा चढ़ाया था, जिससे उन्होंने अपने हाथ बचा लिए, लेकिन जाटों के हाथ लहू से भिगो कर अपना बदला ले लिया। मैं आज तक नहीं जानता कि यह अंदाज़ा कितना सच है और कितना झूठ। मैंने सिर्फ़ बर्बाद होता घर देखा है, और सुन्दर चाचा की वह सानगी सुनी है जो आधी-आधी रात तक बैनों की तरह बजा करती थी।

५. कला के आलोचकों का कर्म आपकी नज़र में क्या है?
इमरोज़: कला के फलों और फूलों का माली मैं सिर्फ़ कलाकार को मानता हूँ। कोई आलोचक उसका माली नहीं हो सकता। लेकिन वह एक अच्छा मौसम ज़रूर हो सकता है। यह एक उदास इतिहास है कि आलोचक एक अच्छा मौसम होने की जगह, अकसर फलों को ठोंग मारने वाला जंगली तोता हो जाता है। और कई बार पत्तों को खाने वाला कीड़ा तक भी।

६. ज़िन्दगी में आप ने कभी कलियुग की घड़ी देखी है? या सतयुग की?
इमरोज़: अपनी मनचाही औरत के साथ बीस साल जी लेना मेरे लिए सतयुग है। और 1960 में जब मैंने अपने मन की दुविधा के कारण उसी औरत को स्वीकार करके भी स्वीकार नहीं किया था, तो वह मेरे लिए कलियुग की घड़ी थी।

७. हमारे देश के सात पवित्र स्थान सात पुरियां कहे जाते हैं- अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, कांची, अवन्ती और द्वारावती। यह सातवीं पुरी द्वारावती समुद्र के किनारे पर हुआ करती थी, जो कृष्ण के देह त्यागने के बाद सातवें दिन समुद्र में अलोप हो गई थी। अब यूँ तो वह द्वारिका के नाम से दूसरी जगह बस गई है, लेकिन अपने मूल स्थान से अलोप हो चुकी है। मेरा सातवां सवाल आप के मन के समुद्र में अलोप हो गई पुरी जैसा है, जिसकी खोज आपको खुद करनी है, और उसका इतिहास खुद ढूंढना है।
इमरोज़: यहाँ मैं कलैक्टिव मन की बात करना चाहता हूँ। इस मन के समुद्र में जो पुरी अलोप हो गई है वह इंसान के धर्म की पुरी है। वह द्वारावती अब अनेक धर्मस्थानों के नाम पर जगह-जगह बस गई है, लेकिन किसी स्थान पर भी धर्म की आत्मा नहीं बस सकी। आत्मा समुद्र में अलोप हो गई है।

स्थानों की स्थापना अंधी श्रद्धा के कारण हुई है, आँखों वाले विश्वास के कारण नहीं। धर्म कभी आँखों की बलि नहीं माँगता।