इस बार’ – कुमार अम्बुज

एक किताब खरीदी जाएगी कविताओं की
और एक फ्रॉक बिटिया के लिए

छेदों वाली साड़ी
माँ की दिनचर्या से अलग हो जाएगी
एक बिन्दी का पत्ता चुन कर खरीदने का वक़्त होगा
बाहर की खिड़की के लिए पर्दे के कपड़ा
और अचार के लिए
खरीदा जाएगा थोड़ा-सा आँवला
उस पीले फूल के गुलदस्ते का भाव तय करते हुए
एक कॉफी पी जाएगी फुरसत के साथ

बर्फ ज़्यादा नहीं गिरेगी
हवा का गुस्सा कम होगा इस बार
चेहरों का पीलापन मरेगा
और हम
एक-दूसरे को देख कर सचमुच खिल उठेंगे

हाँ, यह सब होना है
इस बार के ऐरिअर्स पर..।


चित्र श्रेय: Tanmay Soni

 


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

4 Comments

  • ROHIT RAI · March 26, 2018 at 11:59 am

    uttam kriti

      Posham Pa · March 30, 2018 at 4:29 pm

      Bilkul. Thanks for reading 🙂

  • Kumar Ambuj · April 26, 2018 at 1:04 am

    भाई, 1985 के आसपास लिखी यह कविता तो मेरे पास भी नहीं है। किसी पत्रिका में छपी थी। वर्षों बाद इसे देखकर एक नाॅस्टेल्जिक अनुभूति हुई। धन्यवाद ।

      Posham Pa · April 26, 2018 at 11:30 pm

      सर, भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित ‘भारतीय कविताएँ: 1989-90-91’ में यह कविता पढ़ने को मिली। सोचा इतनी सुन्दर कविता ज़रूर सबसे साझा होनी चाहिए। यह कविता आप तक पहुँची, यह बड़ी खुशी की बात है हमारे लिए। 🙂

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