इस बार’ – कुमार अम्बुज

एक किताब खरीदी जाएगी कविताओं की
और एक फ्रॉक बिटिया के लिए

छेदों वाली साड़ी
माँ की दिनचर्या से अलग हो जाएगी
एक बिन्दी का पत्ता चुन कर खरीदने का वक़्त होगा
बाहर की खिड़की के लिए पर्दे के कपड़ा
और अचार के लिए
खरीदा जाएगा थोड़ा-सा आँवला
उस पीले फूल के गुलदस्ते का भाव तय करते हुए
एक कॉफी पी जाएगी फुरसत के साथ

बर्फ ज़्यादा नहीं गिरेगी
हवा का गुस्सा कम होगा इस बार
चेहरों का पीलापन मरेगा
और हम
एक-दूसरे को देख कर सचमुच खिल उठेंगे

हाँ, यह सब होना है
इस बार के ऐरिअर्स पर..।


चित्र श्रेय: Tanmay Soni

 


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

2 Comments

  • ROHIT RAI · March 26, 2018 at 11:59 am

    uttam kriti

      Posham Pa · March 30, 2018 at 4:29 pm

      Bilkul. Thanks for reading 🙂

  • Leave a Reply

    Related Posts

    कविताएँ | Poetry

    तेरे अनन्य प्रतिरूप अपने लिए बनाये हैं मैंने।

    उड़िया कविता: ‘प्रतिरूप’ – अपर्णा महान्ति पास नहीं हो इसीलिए न! कल्पना के सारे श्रेष्ठ रंग लगाकर इतने सुन्दर दिख रहे हो आज! विरह की छेनी से ठीक से तराश-तराश कर तमाम अनावश्यक असुन्दरता काट-छाँटकर Read more…

    कविताएँ | Poetry

    मराठी कविता: ‘श्वेतपत्र’ – शरण कुमार लिंबाले

    ‘श्वेतपत्र’ – शरण कुमार लिंबाले (रूपान्तर: प्रकाश भातम्ब्रेकर) खोये हुए बालक-सा प्रजातन्त्र जो माँ-बाप का नाम भी नहीं बता सकता न ही अपना पता और सत्ता भी मानो नीची निगाहों से रास्ता नाप रही पतिव्रता Read more…

    कविताएँ | Poetry

    अंकल आई एम तिलोत्तमा!

    कविता: ‘पहचान और परवरिश’ – प्रज्ञा मिश्रा कौन है ये? मेरी बिटिया है, इनकी भतीजी है, मट्टू की बहन है, वी पी साहब की वाइफ हैं, शर्मा जी की बहू है। अपने बारे में भी Read more…

    error:
    %d bloggers like this: