मैं आज स्माल टाउन-सा फ़ील कर रहा हूँ…

और मैं मेट्रो-सी।

पढ़ने में सामान्य लेकिन शिकायत और शरारत दोनों दिखाती इन पंक्तियों से शुरू होने वाली इस किताब के बारे में लिखने में मुझे काफी देर हो गयी लेकिन फिर प्रत्येक किताब हमेशा किसी न किसी के लिए तो नई रहती ही है। तो उन्हीं लोगों के लिए बता दूँ कि 2015 के विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली में जाने की तैयारी थी जब यह खबर मिली थी कि रवीश कुमार की एक किताब लॉन्च हो रही है। उनकी पत्रकारिता से पहले ही प्रभावित रह चुका था तो उनकी किताब पढ़ने की उत्सुकता स्वाभाविक थी। लेकिन यह उत्सुकता एक तरह के रोमांच में बदल गयी जब मुझे किताब का नाम पता चला- ‘इश्क़ में शहर होना’। पहले तो समझ नहीं आया, फिर दिमाग लगाया तो दो मतलब जान पड़े और जब किताब पढ़ी तो दोनों ही मतलब अपने-अपने स्तर पर सार्थक भी लगने लगे।

किताब पढ़कर पता चला कि एक ऐसे शहर, अपनी दिल्ली, की बात है जो इश्क़ में है। या फिर एक ऐसे इंसान की, जो इश्क़ में है, और इसीलिए शहर सरीखा है। लेकिन उस शहर और उस इंसान को देखने के लिए वो नज़र ज़रूरी है जो इश्क़ को एक पवित्र न सही, एक ज़रूरी न सही, एक मूल भाव की तरह तो देखता ही हो.. थोड़ी लापरवाही से, बिना किसी सीरियस थॉट के, बिना कोई सीरियस गाइडलाइन्स उस पर मढ़े। उसे बस रहने दे, जैसा वो है, बस होने दे। और यही होना, इश्क़ में… शहर होना है।

इस किताब के बारे में हमेशा से लिखना चाहता था और मेरे पास इस किताब के बारे में बताने के लिए बहुत कुछ है, इसलिए यह फैसला नहीं कर पा रहा हूँ कि कहाँ से शुरू किया जाए। चलिए पहले बात इस किताब की विषय-वस्तु, इसके कॉन्टेंट की कर लेते हैं। यह किताब राजकमल प्रकाशन द्वारा निकाली गयी लप्रेक श्रृंखला की पहली कड़ी है। दूसरी और तीसरी क़िस्त भी विनीत कुमार की ‘इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं’ और गिरीन्द्र नाथ झा की ‘इश्क़ में माटी सोना’ के रूप में आ चुकी हैं। लप्रेक यानी लघु प्रेम कथा। जिसे फेसबुक-फिक्शन भी कहा गया क्योंकि इसकी शुरुआत किताब का रूप लेने से पहले, फेसबुक स्टेटस अपडेट्स के रूप में हो चुकी थी।

एक दूसरे के प्रेम में खोए विभिन्न जोड़ों की एक छोटी सी बातचीत जिसमें संवाद भले ही शाब्दिक वजन न रखते हों लेकिन उस समाज में रहते हुए उस प्रेम को जीते रहने के लिए जो संघर्ष करना पड़ता है, साफ़ झलकता है। भीड़ में हाथ पकड़ने के लिए तरसना हो, या बस के धक्के खाकर किसी से जाकर मिलना, जाति और भाषा का अंतर हो या प्यार के पलों में बोरिंग बातें सुनने की खीझ, प्रेम के ये वाले तार इतनी सरलता से किसी को छेड़ते मैंने तो पहले नहीं देखा। वैसे भी एक पारम्परिक उपन्यास में आमने-सामने हॉस्टल में रहते एक युगल की प्रेम कहानी मुझे तो हमेशा बोर करती रही है। ऐसे में केवल कुछ पल, कुछ चुनिंदा पल, प्रेम की व्यावहारिक परतों में चढ़ाकर आपके सामने रख देना लेखक के पक्ष से एक अनोखी चीज़ थी, जिसे लोगों ने पसंद भी किया है-

“दोनों की मुलाक़ात छतरपुर के मंदिर में हुई। मगर अच्छा लगता था उन्हें जामा मस्जिद में बैठना। इतिहास से साझा होने के बहाने वर्तमान का यह एकांत।”

इस पसंद का कारण यह भी हो सकता है कि आज के समय में प्रेम ऐसा ही रूप ले चुका है। प्रेम में, समर्पण में, ख़्याल में कमी नहीं आयी, लेकिन प्रेम के नाम पर खुद को ही बर्बाद कर लेना आजकल के प्रेमियों को नहीं आता। किसके पास वक़्त है सालों प्रेम के नाम पर व्यर्थ इंतज़ार करने का, जहाँ एक मिनट सांस लेने की फुर्सत नहीं। वह प्रेम ही क्या जो आगे न बढ़ाए, जो आज़ाद न करे.. और दिल्ली जैसा शहर तो आपको दोनों ही चीज़ें सिखाता है।

शायद इसीलिए रवीश ने दो प्रेमियों की नज़रों से दिल्ली दिखाने का फैसला किया। उन्होंने शायद कभी खुद भी दिल्ली को इसी नज़र से देखा होगा। लेकिन अगर आप इस किताब को पढ़ेंगे तो कह नहीं पाएंगे कि यह नज़र सिर्फ रवीश की है। वे दो लोग जो दिल्ली में अपने प्रेम को बैकपैक में लादे फिरते हों, या फिर समेट कर किसी टीले के एक एकांत कोने में निहारते हों, उनका और रवीश का नज़रिया दिल्ली को लेकर अलग नहीं होगा-

“नेहरू पार्क की झाड़ियों में सरसराहट से दोनों सहम गए। पत्तियों की झुरमुट से धड़कती आँखों से कोई उन्हें भकोस रहा था। दिल्ली में महफूज़ जगह की तलाश दो ही लोग करते हैं- जिन्हें प्रेम करना है और जिन्हें प्रेम करते हुए लोगों को देखना है।”

ऐसे ही कुछ दिलचस्प और सहज शॉर्ट किस्सों का पिटारा है ‘इश्क़ में शहर होना’, जिसमें दिल्ली की अलग-अलग जगहों के मिजाज़ का अंदाज़ा वहाँ से गुजरने और वहाँ ठहरने वाले प्रेमियों की बातों से लगाया गया है।

“इंडिया गेट के पेड़ भी हरजाई हैं। छाँव के नीचे पीठ जलाते हैं।”

वो पाठक जो हिन्दी में कुछ नया ढूँढ रहे हैं, जिन्हें रोमांस पसंद है और जो एक पुराने ढर्रे के बॉलीवुड टाइप प्रेम दिखाते उपन्यासों को पढ़कर ऊब चुके हैं, उनके लिए यह किताब एकदम परफेक्ट है। इसमें अंग्रेजी और मॉडर्न टेक्नोलॉजी की बातें केवल यह दिखाने के लिए नहीं की गयीं कि ये नए ज़माने के पात्र हैं, बल्कि इसमें पात्रों के ज़रिये लेखक की प्रोग्रेसिव सोच भी सामने आती है वो भी केवल दो-चार वाक्यों की बातचीत में ही।

भाषा की बात करें तो अंग्रेजी और आम बोल-चाल के शब्दों का इतना सहज प्रयोग रवीश से सीखना चाहिए। जो बात जिस भाषा में आम ज़िन्दगी में कही जाती है, उसी भाषा में इस किताब में कही गयी है। हिन्दी किताब है, न तो केवल इसलिए प्रचलन के बाहर के शब्द जोड़े गए और नयी पीढ़ी की ज़बान है, न केवल इसलिए ज़बरदस्ती अंग्रेजी ठूसी गयी है। नियमित हिन्दी पाठकों के लिए जहाँ यह किताब एक सुहाने से सरप्राइज के रूप में आयी है, वहीं इंग्लिश स्पीकर्स, जो हिन्दी पढ़ना चाहते हैं उनके लिए यह एक अनमोल तोहफा है, जिसे उन्हें जल्द से जल्द अपने शॉपिंग कार्ट में जोड़ लेना चाहिए।

लिवाइस का ब्लू जीन्स और क्रोकोडाइल का व्हाइट टी शर्ट। साउथ एक्स से खरीद कर दोनों बहुत खुश थे। पचासी फुट की शिवमूर्ति के नीचे उसने मदर डेयरी के पैकेट को दांत से काट दिया। वह शिवा पर दूध चढ़ाने लगी। उसके टैग के धूप-चश्मे में घूरता हुआ अघोरी दिख गया । गुस्से में नारियल ऐसे फोड़ा कि वह हल्के से चीख उठी। उप्स…इग्नोर न! स्पिरिचुअल होने आए हैं, वायलेंट नहीं। शिवा विल टेक केयर ऑफ़ हिम।

इसी भाषा की वजह से मैंने इस पोस्ट के शीर्षक में इस किताब को नई हिंदी की शोस्टॉपर कहा है। मुझे याद है कि किसी इंटरव्यू में रवीश ने कहा था कि “यह किताब कोई दावा नहीं है ‘साहित्य’ में शामिल होने का”, लेकिन मैंने जितनी नई किताबें पढ़ी हैं और जिन नए लोगों को हिन्दी से जुड़ने की कोशिश करते देखा है, उन कोशिशों को साकार ऐसी ही भाषा कर सकती है जैसी इस किताब में है। सहज, सरल, आम बोल-चाल में आने वाली हिन्दी जो अपने मूल स्वरुप को भी संजोए हुए है। पढ़कर यह कभी नहीं लगा कि यह भाषा ‘सामान्य’ हिन्दी से कुछ अलग है।

इस किताब की एक खास बात यह भी है कि इसके हर पेज पर प्रकाशित हर लप्रेक को विक्रम नायक ने अपने बेइंतेहा खूबसूरत चित्रों से यूँ सजाया है जैसे हम दिवाली पर अपने घरों को सजाते हैं। कहा जाए तो इस किताब की लप्रेक सिर्फ कथाएं नहीं, चित्र-कथाएं हैं। विक्रम की खींची गयी लकीरें रवीश के शब्दों को जैसे आगे बढ़ा रही हों।

कहते ही हैं कि देखा हुआ याद रहता है, विक्रम के चित्रों में याद में रहा आँखों के सामने आ जाता है और हम पहुँच जाते हैं दिल्ली में बिताए अपने इश्क़ के पलों में।

और अंत में आपको बताना चाहूँगा कि जब भी आप यह किताब पढ़ें, इसकी भूमिका को स्किप न करें, छोड़ें नहीं.. रवीश ने इस किताब में जितना कहा है, उससे कहीं ज़्यादा इसकी भूमिका में कह दिया है। किसी भी इंसान की रचनाएँ उसके व्यक्तित्व की ही एक झलक होती हैं। अगर आप व्यक्तिगत तौर पर किसी लेखक की विचारधारा को नहीं समझ पाते, तो आपके लिए उसके लेखन के पीछे की परतों को छांट पाना इतना आसान नहीं होता। इस किताब की भूमिका उन्हीं परतों को खोल पाने में एक पाठक की मदद करती है-

“भजनपुरा के पास के इलाके में किसी दोपहर घूमने चला गया। हर घर में ब्रा बन रहा था। पहली बार मर्द हाथों को ब्रा बनाते देखा। थान-थान ब्रा को देखना भीतर से बाहर आने जैसा था। ऐसा घबराया कि नज़र बचाकर भागने जैसा लौटने लगा। कई दिनों बाद उन गलियों में दोबारा लौटकर गया। हमने पतंग का मांझा बनते देखा था, जमशेदपुर में टाटा स्टील प्लांट में स्टील बनते देखा था। ब्रा भी बनता है, पहली बार देखा। सबको ब्रा बनते देखना चाहिए। किशोर उम्र में बहुत से लोग कपड़े में जिस्म देखा करते थे। कपड़े को कपड़ा समझने के लिए उसका बनते देखना ज़रूरी है। यही करते-करते मैं किताबों की दिल्ली के बीच लोगों की दिल्ली का वकील बन गया। दिल्ली केवल कॉफ़ी-टेबल शहर नहीं है।”

अगर आपको दिल्ली को अपनी ही नज़रों से दोबारा एक नए रूप में देखना हो, या फिर प्रेम के उन पलों को दोबारा जीना हो जो आपका ही शहर अनजाने ही आपसे छीन लेता है या फिर हिन्दी में कुछ हल्का-फुल्का लेकिन बहुत ही खूबसूरत पढ़ना हो तो मुझे नहीं लगता, इससे बेहतर किताब का विकल्प आपके पास है। मुझे दो साल हो गए हैं इस किताब को पढ़ते हुए, लगातार पढ़ते हुए, लेकिन इश्क़ में डूबे इस शहर के लव-कॉर्नर्स आज भी पूरी तरह नहीं छान पाया। आपको भी इसे पढ़कर कोई नया कोना मिले तो पता बता दीजिएगा..। 😉

नोट: इस ब्लॉग का लप्रेक सेक्शन भी इसी किताब की प्रेरणा का फल है, जिसमें इस नए फॉरमेट में हमने भी हाथ आजमाने की कोशिश की है। वक़्त हो तो देखिएगा ज़रूर।

चित्र श्रेय: विक्रम नायक


Puneet Kusum

नाम पुनीत कुसुम है, पेशे से सॉफ्टवेर इंजीनियर हूँ (जल्दी ही यह बताना बंद करना चाहूँगा) और स्वभाव से एक सामान्य इंसान जो भीतर के द्वंद और अंतर्विरोधों से पीछा छुड़ाने का माध्यम कविताओं को मान बैठा है। हिन्दी में पोस्ट ग्रॅजुयेशन ज़ारी है और अपनी कविताओं से लोगों तक पहुँचने के प्रयास भी। पढ़ने का शौक है और पढ़ते हुए जो रत्न मिल जाते हैं, उनको दुनिया तक पहुँचाने की ललक, और इसीलिए पोषम पा। इसके अलावा किसी विशिष्ट परिचय पर अधिकार नहीं है, जैसे होता जाएगा, बताते जाएँगे। :)

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