जब सोच रही थी मैं एक नज़्म

जब सोच रही थी मैं एक नज़्म
वो निकल गई बराबर से
नाराज़गी से मुझे देखती

तवज्जोह नहीं दे सकी मैं
उनकी दानिश-मंदाना बातों पर

पढ़ा तारीख़ गुज़रने के बाद
अहम मुलाज़मत का इश्तिहार
वो भूका रह गया रात भर
चला गया हमेशा के लिए

नहीं मिल सकीं उन्हें बर-वक़्त
सिलाई की मशीनें

लूट लिया उन्होंने सारा खज़ाना
दोनों हाथों से

गिर गई बोसीदा दीवार
स्कूल के बच्चों पर

वो फैल गए हर तरफ़
ख़ुद को और दूसरों को बमों से उड़ाने

क्यों सोच रही थी मैं एक नज़्म..