यशपाल का ‘झूठा सच’

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के एक क्रांतिकारी होने से लेकर हिन्दी लेखक बनने तक का सफर तय करने वाले यशपाल का उपन्यास ‘झूठा सच’ भारत विभाजन की त्रासदी और उसके बाद जनता के बीच उपजे मोहभंग को अंकित करता है। दो भागों (‘वतन और देश’ और ‘देश का भविष्य’) के इस उपन्यास की पृष्ठभूमि विभाजन पूर्व के लाहौर के शांत और सौहार्दपूर्ण वातावरण से शुरू होकर दिल्ली में शरणार्थी पंजाबियों के दोबारा बस जाने के प्रयासों तक पहुँचती है। उपन्यास के केंद्र में यूँ तो लाहौर की भोला पांधे की गली का एक हिन्दू परिवार है, लेकिन आगे चलकर यह उपन्यास पहले पूरे लाहौर, फिर पंजाब और फिर पूरे भारत की तत्कालीन गतिविधियों को साथ लेकर चलने लगता है।

भोला पांधे के परिवार का बेटा जयदेव पुरी, उसकी बहन तारा और प्रेमिका कनक इस उपन्यास के मुख्य पात्र हैं, जिनकी कहानियाँ विभाजन की सरगर्मियों और सांप्रदायिक हिंसा और तनाव से भरे माहौल में साथ-साथ चलती हैं। इन तीन मुख्य और अनगिनत गौण पात्रों के माध्यम से यशपाल ने विभाजन के समय और परिस्थितियों का एक सजीव और प्रमाणिक चित्र प्रस्तुत किया है।

पुरी मध्यमवर्ग का प्रतिनिधि पात्र है, जो अपनी सारी कमज़ोरियों के साथ उपन्यास में मौजूद है। विभाजन से पहले वह अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद पत्रकारिता के ज़रिये राजनेताओं द्वारा फैलाये जा रहे द्वेष को आम जनता के सामने उजागर करता है और अंततः अपने सिद्धांतों के कारण नौकरी से निकाल दिया जाता है। वह एक प्रगतिशील, समझदार और धार्मिक सद्भाव में विश्वास रखने वाला पात्र है। लेकिन नौकरी से निकाल दिए जाने और विभाजन के कारण परिस्थितियां बदलने के बाद उसे दोबारा अपने पैरों पर खड़े होने में काफी संघर्ष करना पड़ता है। विभाजन के समय पुरी और उसके परिवार को लाहौर छोड़ना पड़ता है और पुरी काफी संघर्षों के बाद भारत में एक पत्र का संपादक बन जाता है। आगे चलकर प्रगति करते हुए फिर विधायक और कई सरकारी कमेटियों में मेंबर भी बनता है। और इस तरह पुरी का रूपांतरण हो जाता है एक सिद्धांतवादी आम इंसान से सरकारी अवसरवादी राजनेता में, जिसे अपनी बहन पर अत्याचार करने वाला आदमी भी बुरा नहीं लगता क्योंकि उससे पुरी का काम निकलता है।

तारा मध्यमवर्गीय लेकिन प्रगतिशील सोच रखने वाली एक आम लड़की है, जिसने देश के बंटवारे को एक नागरिक के रूप में कम और एक स्त्री के रूप में ज़्यादा झेला। हिंसा और दंगों के बीच उसके ससुराल से उसे उठा लिया जाता है और उसके बाद उसने जिन हालातों का सामना किया, किन्ही भी राजनैतिक स्थितियों को उन हालातों के कारण के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता, और न ही कोई भी इंसानी माफ़ी तारा के घाव भरने में पर्याप्त सिद्ध हो सकती है। फिर भी तारा उपन्यास में एक सशक्त पात्र के रूप में उभर कर आती है और अपने अतीत को पीछे छोड़ दिल्ली में अपने परिवार से बिछुड़ कर (उन्हें त्याग कर), अकेले, ऊंचे सरकारी ओहदे तक पहुँचती है और अपने ज़िन्दगी के फैसले खुद लेती है।

कनक भी तारा ही की तरह एक प्रगतिशील और नयी सोच रखने वाली, लेकिन एक संपन्न परिवार की लड़की है, जहाँ उसे उसके फैसले लेने में इतनी समस्या नहीं होती, जितनी तारा को। कनक के परिवार को भी विभाजन के समय लाहौर के अपने घर को छोड़कर दिल्ली आकर बसना पड़ता है। कनक पुरी से प्रेम करती है लेकिन वह पुरी के अवसरवादी और छलपूर्ण व्यवहार को अस्वीकार करने की हिम्मत भी रखती है। कनक और पुरी के सम्बन्ध के माध्यम से यशपाल ने अपनी स्त्री सम्बंधित सोच को व्यक्त किया है, जिसमें यशपाल स्त्रियों के सारे फैसले स्त्रियों को ही लेने देने के पक्ष में खड़े नजर आते हैं।

उपन्यास के शुरू में भोला पांधे की गली और आसपास के लाहौर का माहौल बेहद सौहार्दपूर्ण और शांत है जहाँ विभिन्न वर्गों, धर्मों और जातियों के लोग आपस में बिना किसी द्वेष और घृणा के रहते हैं। सब त्यौहार, जन्म-मृत्यु, शादियों में एक दूसरे के यहाँ आते-जाते हैं और एक दूसरे के पारिवारिक और धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हैं। लेकिन इन्ही सबके बीच विभाजन की खबरें ज़ोर पकड़ने लगती हैं; यह समय जून 1947 का है। और देखते ही देखते इन ख़बरों की तादाद और प्रभाव आमजन पर बढ़ने लगता है। गली-मोहल्लों में धार्मिक हिंसा आम बात हो जाती है, कर्फ्यू लगने लगता है, राजनेताओं के भड़काऊ बयान आने लगते हैं और इस निश्चय के साथ कि लाहौर पकिस्तान का हिस्सा होगा, हिन्दू और सिख समुदाय के लोग लाहौर का अपना घर-बार छोड़कर हिन्दुस्तान की ओर रुख करने लगते हैं। बढ़ते-बढ़ते यह हिंसा त्रासदी का रूप ले लेती है और क़त्लों और लाशों से गलियां, मोहल्ले, स्टेशन भर जाते हैं। आम लोगों के लिए विभाजन का समय कितना भयावह रहा होगा, उसका प्रामाणिक और सटीक चित्रण ‘झूठा सच’ के प्रथम भाग ‘देश और विभाजन’ में हुआ है।

उपन्यास के दूसरे भाग में शरणार्थियों के लाहौर से आकर भारत में बसने के प्रयास और हिन्दुस्तानी सरकार के अफसरों की अवसरवादिता और भ्रष्टाचार के कारण जनता का उससे मोहभंग हो जाने की कहानी है। जयदेवपुरी जो पहले भाग में एक नौकरी ढूंढने भारत आता है, वापिस लाहौर नहीं जा पाता और भाग्य से भारत में ही एक समाचार पत्र का संपादक बन जाता है। लेकिन प्रगति की राह पर वह अपना सही-गलत का बोध गंवा देता है और ज़िन्दगी में उसे अब केवल सत्ता, शक्ति और प्रतिष्ठा ही दीखते हैं। पुरी उस सरकारी अफसरों, राजनेताओं के वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, जिन्होंने आज़ादी के बाद जनता की सारी आशाओं पर पानी फेर दिया। इन लोगों के कारण ही जनता के लिए ब्रिटिश साम्राज्यवाद और हिन्दुस्तानी सरकार में कोई ख़ास फर्क नहीं रह गया था, क्योंकि गरीब और मजदूर वर्ग की हालत आज़ादी से पहले भी वही थी जो आज़ादी के बाद रही।

कुछ कम्युनिस्ट पात्रों के द्वारा कांग्रेस की नीतियों के अमानवीय पक्षों को भी पात्रों की बातचीत के ज़रिये यशपाल उद्घाटित करते चलते हैं, हालाँकि कम्युनिस्ट पात्रों का किरदार यशपाल के इस उपन्यास में उतना नहीं है, जितना उनके बाकी उपन्यासों में। इसका कारण यह भी रहा होगा कि यशपाल का ध्येय इस उपन्यास में पाठकों के सामने विभाजन की त्रासदी का एक चित्र प्रस्तुत करना ही रहा होगा, बजाय इसके कि कांग्रेस या सरकार की नीतियों का विश्लेषण किया जाए।

900 पृष्ठों से ज्यादा का यह उपन्यास अपनी कहानी में एकदम सपाट नज़र आया है। यशपाल शुरू से अंत तक केवल कहानी सुनाते चलते हैं लेकिन यह कहानी सुनाना, विभिन्न पात्रों और घटनाओं से इतना प्रमाणिक और यथार्थ के नज़दीक लगता है कि कहीं भी बोझिल महसूस नहीं होता। यह भी कहा जा सकता है कि यह सपाटबयानी उपन्यास के विषय और उद्देश्य के लिए ज़रूरी भी थी। अपने विचार और विचारधारा व्यक्त करने से ज्यादा ज़रूरी है विभाजन के समय की घटनाओं को उनके मूल रूप में प्रस्तुत कर देना, जिससे पाठक उस समय की भयावहता को महसूस कर सकें और यशपाल यह करने में बिलकुल सफल रहे हैं।

उपन्यास की प्रासंगिकता की बात करें तो आजकल जो धर्म के नाम पर एक विवाद और टकराव की स्थिति है, उसमें युवा वर्ग बढ़-चढ़कर सामने आ रहा है और हिंसा करने से भी गुरेज़ नहीं करता। अपने धर्म को लेकर इतना दृढ़ कोई तभी रह सकता है जब इसके दूरगामी परिणामों के बारे में वह अनभिज्ञ हो। आज जो युवा हैं, उन्होंने विभाजन को केवल एक घटना के रूप में जाना है, लेकिन उस त्रासदी को महसूस नहीं किया। यशपाल का यह उपन्यास हम युवा लोगों को यह मौका देता है कि उस त्रासदी का असली चेहरा देखें, महसूस करें और यह निश्चय भी कर सकें कि क्या हमें धार्मिक कट्टरता के उन्हीं रास्तों को अपनाना है जिनका परिणाम विभाजन जैसी भयावह घटनाओं के रूप में हमारा इंतज़ार कर रहा हो…