कहाँ तक जायेगी झंकार?
घर-आँगन, पुर, प्रांत, देश तक या उसके भी पार?
प्रेमी, भक्त, विदग्ध वियोगी
जिसमें भी व्याकुलता होगी
क्या न वही बनकर सहभोगी, छेड़ेगा ये तार?
जाति, धर्म, भाषा से उठकर
मानव-मन की हर धड़कन पर
गूँजेगें क्या मेरे ये स्वर युग-युग इसी प्रकार?
जग तो सच्चा भी है झूठा
जो आँखें मिलते ही रूठा
किन्तु सुना है, काव्य अनूठा रहता सदाबहार!
कहाँ तक जाएगी झंकार?
घर-आँगन, पुर, प्रांत, देश तक या उसके भी पार?