कमरा

बन्द कमरे की चुप दीवारें
करती होगी बातें तो
चुप कमरे की घड़ी पल को
आराम में सुस्ताती तो होगी
शान्त सी मासूम किताबें
आपस में बतियाती तो होंगी
कील पे टंगे कुछ कपड़े
करते होंगे इंतज़ार मेरी देह का
छत पे टंगा पंखा
देखता होगा फाँसी के बुरे ख़याल
जागता होगा नींदों से
माँगता होगा दो घूँट पानी
जैसे मैं घबराकर उड़ेल देता हूँ
पानी भरी बोतल को अपनी देह के भीतर

कुर्सी, टेबल, अलमारी, आईना और भी सारे
मेरे अनुपस्थिति में
खिसक आते हैं एक दूसरे के पास
खाते होंगे साथ में खाना
करते होंगे मेरी बातें

कुर्सी करती है शिकायत
अपने आधे टूटे पैर के लिए
टेबल किताबों के बोझ से थका-सा लगता है
अलमारी की शिकायत है कि
अरसे से नहीं आए कोई नए कपड़े
जिन्हें बना सके वो अपने घर का सदस्य
आईना अपनी धूल में
जैसे उलझा-सा रहता है

खिड़की जैसे माध्यम है
जिससे दिखाई देती है बाहरी दुनिया
एक बूढ़ा दरख़्त, दो घोंसले, एक चूजा
कुछ परिंदे, खुला आसमान, एक जोड़ा

दरवाज़ा करता रहा बरसों हिफाज़त
मेरी और मेरी चीज़ों की
वो जानता है सारे रहस्य
इस कमरे का पुराना इतिहास भी ज़हन में है उसके

नल की टप-टप और घड़ी की टिक-टिक
खामोशी को संगीत में रंगकर
जैसे रचती है कोई गीत ठहराव का

कितना कुछ घटता है
इक बन्द कमरे में
जैसे सुकून की दोपहर में
एक जहाँ ठहरा हुआ रहता है
मैं और मेरा अकेलापन
जैसे काल्पनिक है

इस बन्द कमरे की चुप दीवारों के भीतर
मौन लिए बसता है इक जहाँ
जो सम्वाद से स्थापित करता है सम्बन्ध
महसूस करता है मुझे
मेरे आने के बाद मेरे साथ
वो भी सो जाता है उनींदे ख़्वाबों में कहीं
कुछ ऐसा ही है
अनगिनत भावों से भरा ये कमरा।