जब कविताएँ पढ़ते या लिखते हुए कुछ समय बीत जाता है तो कोई भी पाठक या कविता-प्रेमी अनायास ही कभी-कभी कुछ ऐसे सवालों में खोने लगता है जिनका कोई एक नियत जवाब नहीं हो सकता। जैसे आख़िर कविता है क्या? उसका समाज में महत्त्व क्या है और उसका सृजन क्यों ज़रूरी है? कोई कविता करे तो क्यों करे? और कौन कविता कर पाता है या कह लें कविता किसको चुनती है? अमूमन साहित्यकारों के साक्षात्कारों में या फिर चर्चाओं में ऐसी बातें निकल ही आती हैं और खोजा जाए तो इनमें से प्रत्येक सवाल का जवाब विस्तार में कहीं न कहीं मिल ही जाएगा, यह अलग बात है कि प्रत्येक जवाब एक अलग नज़रिये का परिणाम होगा और विभिन्न लोग उसका अर्थ भी विभिन्न तरीकों से निकालेंगे।

मैंने सोचा कि अगर सवाल कविता को लेकर है तो जवाब भी कविता में क्यों न हो? और दिमाग पर थोड़ा जोर डालने पर कुछ ऐसी कविताएँ, कुछ ऐसे अंश इक्कट्ठे कर पाया जो बड़े ही प्रभावशाली तरीके से कविता को परिभाषित करते हैं और मन में उठते इन सवालों को शांत नहीं भी करते, तो इन सवालों को ही एक नए नज़रिये से देखने पर मजबूर तो करते ही हैं। कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं-

सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ की कविता ‘कविता’ का अंश-

धूमिल नीचे दी गयी पंक्तियों में यह साफ़ कहते हैं कि वह ज़माना बीत चुका है जब मानवीय संवेदनाएं किसी व्यक्ति के जीवन की दिशा निर्धारित करती थीं। अब तो अगर कोई व्यक्ति खुद को या अपनी सोच को अकेला पाता है तो उसके पास केवल कविता का ही आसरा है।

“वह बहुत पहले की बात है
जब कहीं किसी निर्जन में
आदिम पशुता चीख़ती थी और
सारा नगर चौंक पड़ता था
मगर अब –
अब उसे मालूम है कि कविता
घेराव में
किसी बौखलाए हुए आदमी का
संक्षिप्त एकालाप है”

‘धूमिल’ की कविता ‘मुनासिब कार्यवाही’-

कविता सिर्फ अपने मन के भावों को आवाज़ देने का ही नाम नहीं है, अगर कोई चाहे तो खोए हुए मानवीय मूल्यों तक कविता के रास्ते वापिस भी लौटा जा सकता है-

“कविता क्या है
कोई पहनावा है, कुरता पाजामा है
ना भाई ना
कविता शब्दों की अदालत में
मुजरिम के कटघरे में खड़े
बेकसूर आदमी का
हलफनामा है
क्या वह व्यक्तित्व बनाने की
चरित्र चमकाने की
खाने कमाने की चीज़ है
ना भाई ना
कविता
भाषा में
आदमी होने की तमीज़ है”

कुँवर नारायण की कविता ‘कविता’-

समाज में जो कुछ घट रहा हो, उसको ईमानदारी से लिखना और जो घट चुका है उससे सीखने की प्रेरणा देने का ही नाम कविता है।

“कविता वक्तव्य नहीं गवाह है
कभी हमारे सामने
कभी हमसे पहले
कभी हमारे बाद

कोई चाहे भी तो रोक नहीं सकता
भाषा में उसका बयान
जिसका पूरा मतलब है सच्चाई
जिसका पूरी कोशिश है बेहतर इन्सान

उसे कोई हड़बड़ी नहीं
कि वह इश्तहारों की तरह चिपके
जुलूसों की तरह निकले
नारों की तरह लगे
और चुनावों की तरह जीते

वह आदमी की भाषा में
कहीं किसी तरह ज़िन्दा रहे, बस।”

कुछ और भी कविताएँ हैं, जो ‘कविता’, उसके अस्तित्व, रंग-रूप और एक कवि से उसके रिश्ते को बखूबी बयान करती हैं। पढ़िए और अगर आपको कोई नयी परिभाषा मिले, तो बताइएगा।

कुँवर नारायण की कविता ‘बाकी कविता’-

“पत्तों पर पानी गिरने का अर्थ
पानी पर पत्ते गिरने के अर्थ से भिन्न है।

जीवन को पूरी तरह पाने
और पूरी तरह दे जाने के बीच
एक पूरा मृत्यु-चिह्न है।

बाकी कविता
शब्दों से नहीं लिखी जाती,
पूरे अस्तित्व को खींचकर एक विराम की तरह
कहीं भी छोड़ दी जाती है…”

कुँवर नारायण की कविता ‘कविता की ज़रुरत’-

“बहुत कुछ दे सकती है कविता
क्योंकि बहुत कुछ हो सकती है कविता
ज़िन्दगी में

अगर हम जगह दें उसे
जैसे फलों को जगह देते हैं पेड़
जैसे तारों को जगह देती है रात

हम बचाये रख सकते हैं उसके लिए
अपने अन्दर कहीं
ऐसा एक कोना
जहाँ ज़मीन और आसमान
जहाँ आदमी और भगवान के बीच दूरी
कम से कम हो।

वैसे कोई चाहे तो जी सकता है
एक नितान्त कवितारहित ज़िन्दगी
कर सकता है
कवितारहित प्रेम”

रघुवीर सहाय की कविता ‘आज फिर शुरू हुआ’-

“आज फिर शुरू हुआ जीवन

आज मैंने एक छोटी-सी सरल-सी कविता पढ़ी
आज मैंने सूरज को डूबते देर तक देखा

जी भर आज मैंने शीतल जल से स्नान किया

आज एक छोटी-सी बच्ची आई, किलक मेरे कन्धे चढ़ी
आज मैंने आदि से अन्त तक पूरा गान किया

आज फिर जीवन शुरू हुआ।”

धर्मवीर भारती कहते हैं-

“भूख, खूरेज़ी, ग़रीबी हो मगर
आदमी के सृजन की ताक़त
इन सबों की शक्ति के ऊपर है
और कविता
सृजन की आवाज़ है…
क्या हुआ दुनिया अगर
मरघट बनी
अभी मेरी आख़िरी आवाज़ बाक़ी है
…कौन कहता है कि कविता मर गई है !”

इन कविताओं को पढ़कर एक सुकून सा मिलता है। लगता है कि ये ही सर्वश्रेष्ठ कविताएँ हैं, इनसे बेहतर कुछ लिखा ही नहीं गया है। और वह शायद इसलिए क्योंकि इन सभी कविताओं में शब्दों के बीच छिपे हुए वो कारण दिख जाते हैं, वह प्रेरणा दिख जाती है, जिस वजह से उस कविता को लिखने वाले ने कभी पहली बार कलम उठायी होगी। ऊपर दी गयी कविताओं में भी केवल ‘कविता’ परिभाषित नहीं हुई है, उन कवियों का सम्पूर्ण लेखन परिभाषित हुआ है। और कौन जाने, जैसे हम कोई चीज़ याद रखने के लिए कुछ लिखकर अपनी अलमारी या डेस्क पर लगा लेते हैं, ये कविताएँ भी इन सभी कवियों का खुद से किया गया एक ईमानदार संकल्प हो।

‘कविता’ पर न तो इतना ही लिखा गया है और न ही इतना पर्याप्त है। जैसे-जैसे कविताओं में ऐसी बातें आँखों के सामने से गुजरती जाएँगी, इस पोस्ट को आगे बढ़ाकर साझा करता रहूँगा। तब तक के लिए आप भी सोचिए कि आपके लिए कविता क्या है..।


चित्र श्रेय: Ella Jardim


Puneet Kusum

नाम पुनीत कुसुम है, पेशे से सॉफ्टवेर इंजीनियर हूँ (जल्दी ही यह बताना बंद करना चाहूँगा) और स्वभाव से एक सामान्य इंसान जो भीतर के द्वंद और अंतर्विरोधों से पीछा छुड़ाने का माध्यम कविताओं को मान बैठा है। हिन्दी में पोस्ट ग्रॅजुयेशन ज़ारी है और अपनी कविताओं से लोगों तक पहुँचने के प्रयास भी। पढ़ने का शौक है और पढ़ते हुए जो रत्न मिल जाते हैं, उनको दुनिया तक पहुँचाने की ललक, और इसीलिए पोषम पा। इसके अलावा किसी विशिष्ट परिचय पर अधिकार नहीं है, जैसे होता जाएगा, बताते जाएँगे। :)

2 Comments

  • Neerja · March 20, 2018 at 2:23 pm

    बहुत खूबसूरत लेख और बहुत खूबसूरत ब्लॉग.

      Posham Pa · March 21, 2018 at 9:32 pm

      बहुत शुक्रिया, नीरजा जी। 🙂

  • Leave a Reply

    Related Posts

    कविताएँ | Poetry

    उड़ना, उड़ते रहना, उड़ते जाना..

    गुजराती कविता: ‘अपना तो’ – मफत ओझा ये सब के सब जैसे-के-तैसे सोफासेट, पलंग, कुर्सी, खिड़कियाँ, दरवाज़े, पर्दे सीलिंगफैन, घड़ी की सुइयाँ- टक-टक और बन्द अँधेरी दीवारों पर टँगा है ईश्वर नश्वर पिता के फोटो Read more…

    कविताएँ | Poetry

    तेरे अनन्य प्रतिरूप अपने लिए बनाये हैं मैंने।

    उड़िया कविता: ‘प्रतिरूप’ – अपर्णा महान्ति पास नहीं हो इसीलिए न! कल्पना के सारे श्रेष्ठ रंग लगाकर इतने सुन्दर दिख रहे हो आज! विरह की छेनी से ठीक से तराश-तराश कर तमाम अनावश्यक असुन्दरता काट-छाँटकर Read more…

    कविताएँ | Poetry

    मराठी कविता: ‘श्वेतपत्र’ – शरण कुमार लिंबाले

    ‘श्वेतपत्र’ – शरण कुमार लिंबाले (रूपान्तर: प्रकाश भातम्ब्रेकर) खोये हुए बालक-सा प्रजातन्त्र जो माँ-बाप का नाम भी नहीं बता सकता न ही अपना पता और सत्ता भी मानो नीची निगाहों से रास्ता नाप रही पतिव्रता Read more…

    error:
    %d bloggers like this: