झूठ बोलिए, सच बोलिए, खचाखच बोलिए

कविता: ‘खचाखच बोलिए’ – शिवा

बोलिए
बोलना ज़रूरी है
सुनना, पढ़ना, समझना मूर्खों के लिए छोड़ दीजिए
सत्ता की शय से बोलिए
चढ़ गयी मय से बोलिए
‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ के लिए बोलिए
‘अधिकतम आउटरीच’ के लिए बोलिए
मूर्ख ना लगने के लिए बोलिए
जनता बहरी है, ठगने के लिए बोलिए
दूर तक बात पहुँचाने के लिए बोलिए
पास वाले की आवाज़ दबाने के लिए बोलिए
‘नॉलेज’ बघारने के लिए बोलिए
या यूँ ही बस दुतकारने के लिए बोलिए
क्रांति लाने के लिए बोलिए
भ्रांति फैलाने के लिए बोलिए
अधपके विचारों के लिए बोलिए
राजनैतिक शिकारों के लिए बोलिए
झूठ बोलिए, सच बोलिए
बस बोलिए, खचाखच बोलिए
सुनने से सुनाई दे जाता है
सच
पढ़ने से दिखाई दे जाता है
आईना
मुँह मिला है, तो बस बोलिए!

■■■

चित्र श्रेय: Cristian Newman

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This Post Has 2 Comments

  1. वाह बहुत मौजूँ

    1. बहुत शुक्रिया। 🙂

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