‘खटमलों की फ़रियाद’ – सैयद महमूद ख़ुंदमीरी ‘तालिब’

एक दिन एक जोंक से कुछ खटमलों ने ये कहा
दीजिए ख़ाला हमें भी कोई ऐसा मशवरा

अब बजाए खून कोई और ही शै पी सकें
आदमी से दूर रहकर हम खुशी से जी सकें

क्यूंकि इसमें खून अब कम कम ही पाया जाए है
अब न चूसा जाए है इसको न चाटा जाए है

इसकी शिरयानों में यूं तो खून मिलता ही नहीं
मिल भी जाता है तो इस में ज़ायका कुछ भी नहीं

कौन जाने क्या बला खाने लगा है आदमी
किस मिलावट की ग़िज़ा खाने लगा है आदमी

हम जो पीते हैं उसे ख़ून मानना बेकार है
क्यूंकि इसका रंग भी पहचानना दुश्वार है

इसमें सुर्ख़ी से ज़्यादा है सफ़ेदी आजकल
ख़ून की सूरत हो गयी है दूध की सी आजकल

एक ज़माना था कि हमने ख़ून के दरिया भी पिए
आज घंटों चूसते हैं एक क़तरे के लिए

क्या कहें ख़ाला हमारी प्यास बुझती ही नहीं
इससे पहले ये गिरानी ख़ून की थी ही नहीं

अब हसीनों की रगों में भी लहू बाक़ी नहीं
इनकी महफिलों में भी कोई भरा साक़ी नहीं

पहले इनका ख़ून हुआ करता था मानिंद शराब
यूँ महकता था रगों में जैसे गुलशन में गुलाब

चूसते ही इनको अपना भी निखरता था शबाब
एक नयी करवट बदलता था बदन में अज़तराब

बू-ए-खूनों से मस्त हो कर झूमने लगते थे हम
अपनी अपनी खटमलियों को चूमने लगते थे हम

हो गए हैं आजकल वो नौजवान भी बदमज़ा
जिनकी शिरयानो में बहती थी कभी जू-ये तिला

जिनका ख़ून पीते ही अक्सर मौज में आते थे हम
मुँह लगाते ही जिन्हें सर-शार हो जाते थे हम

अब उन्हीं को चूसकर बीमार पड़ जाते हैं हम
सूख जाते हैं, सुकड़ जाते हैं, सड़ जाते हैं हम

अब कहाँ तक हम करें अपने ग़मों का तज़किरा
कुछ दिनों पहले हमारे साथ ऐसा भी हुआ

फूट निकली थी हमारे जिस्म से गांजे की बू
पी लिया था भूलकर हमने जो हिप्पी का लहू

क्या कहें क्या क्या बला, क्या क़हर उनके ख़ून में है
टिक-ट्वेंटी से ज़्यादा ज़हर उनके ख़ून में है

अपनी सारी चाशनी खोने लगा है आदमी
हाय! कितना बे-मज़ा होने लगा है आदमी

सुन चुकी है खटमलों की दास्ताने-तिशनगी
एक अदाए ख़ून चकान से जोंक यह कहने लगी

आज तक तूने पिया है सिर्फ जनता का लहू
अब ज़रा पी कर तो देखो एक नेता का लहू

अब तो मेरा भी गुज़ारा है इन्ही के ख़ून पर
क्या बताऊँ मैं कि इसमें ज़ाइक़ा है किस क़दर

उनका खून पीकर बहुत मख़मूर हो जाती हूँ मैं
आम जोंकों के ग़मों से दूर हो जाती हूँ मैं

मुँह लगाते ही उन्हें चालाक हो जाती हूँ मैं
बे-ज़रुरत ही सही बे-बाक हो जाती हूँ मैं

उनकी हर शिरयां होती है खज़ाना ख़ून का
एक एक नेता है गोया कारख़ाना ख़ून का

किस क़दर ख़ुश ज़ाइक़ा होता है उन सब का लहू
भूखी जनता का लहू भी कुछ लहू है, आक! थू!

एक भी क़तरा किसी नेता का जो पा जाएगा
उसको जनता के लहू का भी मज़ा आ जाएगा!

■■■


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

Leave a Reply

Related Posts

कविताएँ | Poetry

तेरे अनन्य प्रतिरूप अपने लिए बनाये हैं मैंने।

उड़िया कविता: ‘प्रतिरूप’ – अपर्णा महान्ति पास नहीं हो इसीलिए न! कल्पना के सारे श्रेष्ठ रंग लगाकर इतने सुन्दर दिख रहे हो आज! विरह की छेनी से ठीक से तराश-तराश कर तमाम अनावश्यक असुन्दरता काट-छाँटकर Read more…

कविताएँ | Poetry

मराठी कविता: ‘श्वेतपत्र’ – शरण कुमार लिंबाले

‘श्वेतपत्र’ – शरण कुमार लिंबाले (रूपान्तर: प्रकाश भातम्ब्रेकर) खोये हुए बालक-सा प्रजातन्त्र जो माँ-बाप का नाम भी नहीं बता सकता न ही अपना पता और सत्ता भी मानो नीची निगाहों से रास्ता नाप रही पतिव्रता Read more…

कविताएँ | Poetry

अंकल आई एम तिलोत्तमा!

कविता: ‘पहचान और परवरिश’ – प्रज्ञा मिश्रा कौन है ये? मेरी बिटिया है, इनकी भतीजी है, मट्टू की बहन है, वी पी साहब की वाइफ हैं, शर्मा जी की बहू है। अपने बारे में भी Read more…

error:
%d bloggers like this: