बस! इतना ही फर्क पड़ा था, बातें, बहसें बन्द हो गयी थी और आवाज़ के अकाल ने घर में एक ऐसी गाढ़ी धुन्ध का रूप ले लिया था जिसमें सब आकार, रिश्ते, रिश्तों की बेहद नाजुक डोरियाँ गडमड हो गयी थीं, क्योंकि कोई समझ नहीं पाता था उन्हें कहाँ से पकड़ा जाए …आखिर कहीं कुछ जता सकने पर, उछाल पाने पर ही सम्बन्धों का विश्वास हाथ लगता है।

दोनों अटल थे अपनी-अपनी जगह पर। बाऊजी अपनी बात पर- शमीम इस घर में नहीं आएगी, और भैया- आएगी तो बस शमीम ही आएगी, और कोई नहीं।

माँ बीच में, जैसे एक लरजती हुई लहर, पता नहीं किसकी ज़मीन पर लेटें। दुख बाऊजी के साथ उन्होंने भी देखे थे। उस पाँच नदियों की धरती पर उठती हिंसा की लपटों के प्रतिबिम्ब उनकी आँखों में भी उतने ही ताजे थे।

दहशत- भरी ठसाठस भीड़। हर किसी में पहले चढ़ने की आपाधापी… लोगों को ट्रकों में लाद-लादकर हिन्दुस्तान बॉर्डर पर पहुँचाया जा रहा था।

माल की तरह लाद दी जाने वाली गर्भिणी माँ को अपने आसपास देखते अचानक एहसास हुआ कि बाऊजी उसी ट्रक पर चढ़ नहीं पाये हैं, तो वह ट्रक से कूद पड़ने को तैयार हो गयी थीं। जाने कैसी तीखी अरक्षा उन दिनों थी… पता नहीं, कौन किससे कब, कहाँ बिछुड़ जाएे और फिर कभी उसका मुख देखना नसीब न हो।

ड्राइवर ट्रक स्टार्ट कर चुका था। दो मजबूत हाथों ने उन्हें उसी भीड़ के ढेर में वापिस ढकेल दिया, जिसे अपनी कोहनियों से धकियाती-चीरती वह इस सिरे तक पहुँची थी। आँखों पर दुपट्टा रखे वह सारे रास्ते बिलखती आयी थीं।

अम्बाला कैम्प में पहुँचकर बौरायी आँखों से वह बाऊजी को खोजती-ढूँढ़ती भटकती फिरीं।

“क्यो भाई, दूसरा ट्रक लायलपुर से चला था?”

“चला होगा… मुझे पता नहीं बीबी।”

“क्यों भाई, कोई ट्रक लायलपुर से आया है आज…?”

“पता नहीं बीबी… कैम्प के इंचार्ज से पूछ लो।”

हर किसी की आँख में लपट की तरह जलती वही तलाश। पैर एक-दूसरे को लाँघते हुए। माँ बावरी आँधी की तरह एक तम्बू से दूसरे, दूसरे से तीसरे में भटकती फिरीं। आने वाले ट्रकों के सामने वह तब तक जमी खड़ी रहतीं, जब तक एक-एक प्राणी उतर न लेता। दाढ़ी बढ़े लोगों को वहा आँखें फाड़-फाड़कर देखतीं…क्या पता इस चेहरे के पीछे कोई दूसरा चेहरा निकल आये।

और एक दिन छावनी के पीछे वाले कैम्प में माँ को बाऊजी मिल गये… बुखार से तपते… उलटियाँ, दस्त करते… उनके शरीर का सारा पानी सूख गया था। माँ बड़ी डोल-डोल गयीं।

अच्छी-बुरी जैसी भी देखभाल हुई, उन कैम्पों में घूमती डॉक्टरों की टोलियों द्वारा हुई। बाऊजी बच गये, ‘ठोकरें खाने के लिए’, ऐसा वह अकसर कहते रहते थे। माँ को लगा कम-से-कम पेड़ तो बच गया, हरियाली चाहे सूख गयी है।

रक्त की कमी से पीली हो गयी माँ, ज्यादातर चुप, इधर-से-उधर करवटें बदलते, सफेद डगमग आँखों वाले बाऊजी को बार-बार पानी पिलाते-पिलाते कहतीं, “कोई बात नहीं… होनी कोई अपने साथ ही तो नहीं हुई। सबके साथ हुई है… तुम तसल्ली रखो। जैसा लोग करेंगे, हम भी कर लेंगे। जहाँ सब कुआँ खोदेंगे, वहाँ हम भी खोद लेंगे।”

माँ के ऐसे दिलासे पता नहीं क्यों बाऊजी को कोड़ों-जैसे लगते, शायद उनका पौरुष तिलमिला उठता था, “बस कर… अब बस कर… तू अपना ध्यान कर!”

अपना ध्यान? अपना ध्यान? न खाट थी, न चौपाल, न काम, न ठिकाना, टाट के कपड़े, ठहरा हुआ वक्त, भूख, जगराते, चिन्ता…

माँ बाऊजी से कुछ कहें, इसका क्या लाभ था। बाऊजी माँ से कुछ कहें, इसका भी क्या लाभ…

“यह दिन भी देखने थे।” पस्त माँ ने कपड़ों की छोटी-सी गठरी कोने के हवाले करते हुए कहा। उनका चेहरा फक था, सूखा हुआ।

“वह दिन नहीं रहे तो यह भी नहीं रहेंगे… तू किसी तरह निपट जा, मैं तेरी वजह से कहीं जा नहीं पाता।” उस बड़े-से अहाते की इस छोटी-सी कोठरी में बाऊजी ने नज़रें दौड़ाते हुए कहा।

और उसी कोठरी में अतुल का जन्म हुआ। माँ ने मुक्ति की साँस ली। तीन दिन तक पलँग की पाटी पकड़-पकड़कर वह चीखती रही थीं, और पासवाली बेबे ‘सबर कर पुत्तरा, सबर कर’ के निरावेग दिलासे माँ को देती रही थी, ‘फल भी तो तुझे ही मिलेगा।’

उन दिनों माँ का मुँह देखकर लगता था, यह फल उन्हें न भी मिलता तो भी माँ को कोई दुख न होता। वह अकसर अतुल की तरफ पीठ करके पड़ी रहती… तब तक, जब तक वह अपनी चीख-चिल्लाहट से माँ की ऊपरी शान्ति को भंग नहीं कर देता था। माँ पलटकर अपना स्तन उसे दे देती थीं और उसके एहसास से पूरी तरह बेगानी हो जाती थीं।

मुझे बड़े असुविधाजनक लगते थे वे दिन। दहलीज़ पर बैठे-बैठे, यों ही इधर-उधर देखते होना। पढ़ाई, सिलाई, बुनाई, कढ़ाई, रोटी-पकवान के लिए दिन-रात आदेशों-उपदेशों के अम्बार टपकाती माँ मुझे अब कुछ नहीं कहती थीं। न कहती थीं, सीखना ज़रूरी है। न कहती थीं, नहीं जरूरी। खुद बैठी रहती थीं और मुझे बैठे रहने देती थीं।

एक दिन बाऊजी ने डपटकर माँ से कहा था, “जो हुआ सो हुआ, तुम इस तरह से मुँह लटकाकर वज़न की तरह बँधी रहती हो मेरी जान को… अरे, कुछ अपने होश-हवास सँभालो।”

और माँ को-कुएँ में लटकती हुई माँ को जैसे कोई वापिस ले आया था बाहर। वह सँभलने लगी थीं कतरा-कतरा बाऊजी घर में होते तो कृत्रिम लगने की हद तक वह अतिरिक्त उत्साह बिखेरतीं। उस वक्त वह उनसे भी बड़ी हो गयी दीखतीं…

दीवारों का रंग तो नहीं बदला था। वह वैसी-की-वैसी थीं चूना झाड़तीं, धब्बों में घूरतीं। पर मन का रंग बदलता गया था। कमरा सामान के बिना चौड़ा लगता था। पेट में खासे खोखल थे परन्तु सफेदपोशी ने ढक लिया था बहुत कुछ।

साबुन घिस-भर देने से दूसरे दिन के लिए वही जोड़ा उजला हो जाता था। वही थाली बार-बार माँजी जाने पर चमक जाती थी। पतीली में चाय, दाल और कभी-कभी सब्जी पक जाती थी और उसी में रात को, सबेरे नमकवाली रोटी के साथ खाने को छाछ के लिए पेंदा-भर दही जम जाता था। डालडा भी घी-जैसा ही लगता था। उसकी छौंक ऐसी क्या बुरी थी।…अचार कच्चे आम काटकर नमक-मिर्च-भर डाल देने में खासा खाने लायक हो जाता था; तेज़, हल्दी, सौंफ, मेथी, मर्तबान की ज़रूरत क्या थी।

सब-कुछ हो जाता था… बस! अगर याद न किया जाएे। तुलना न हो उस अतीत से… गलीचों, कुर्सियों, कारों में फिसलते वक्त के उस वकफे से, जिसे किस्मत ने पूरी बेरहमी से काटकर इतना अलग फेंक दिया था कि वह अपने वजूद का हिस्सा ही नहीं लगता था।

सब ठीक था अगर याद न आये कि वहाँ ज़िन्दगी कैसी थी… क्यों थी… और अब कैसी है, क्यों है, जिसके कारण है…

कुछ नहीं बिगड़ता था यदि तुलना न हो, शिनाख्त न हो। ऐशो आराम की तरफ से तो आँख मूँदी जा सकती थी पूरी तरह…

यह शिनाख्त किस तरह शमीम के इस घर में आ जाने से उबरकर सामने आ जाती है… किस तरह वह मात्र एक औरत, एक इनसान, एक पुत्रवधू न रहकर, एक इतिहास, एक जाति, एक परिस्थिति, जलावतन की कँटीली याद का दंश बन जाती है…। उसके होते रहते किस तरह बींध-बींध जाएा करेंगे स्मरण… वह विस्थापन, वह कैम्पों में इधर-से-उधर भूख-प्यास से भटकते होना। वह हाथ न फैलाने की शर्म में दिन-रात अपने आप को खाते होना। …वह इतनी मेहनत के लिए अनभ्यस्त कन्धे… परीक्षा!… इतनी बड़ी परीक्षा… इतनी कड़ी परीक्षा…

“तुम इतना तो सोचो”, उठते-उठते बाऊजी भैया को कोंचते, “अभी तो मेरे तन-मन से गर्दिश के निशान भी नहीं मिटे… अपनी माँ की तरफ देख, कैसी झल गयी है… अभी तक उसके चेहरे का रंग वापिस नहीं आया… बहिन अभी घर बैठी है.. अन्धा हो गया है… क्या ज़रूरी है, हर बात मैं खोलकर कहूँ। तुम कह सकते हो… कहते ही हो… मैं आर्थोडॉक्स हूँ, बदलता नहीं हूँ… क्या ज़रूरी है बदलना इतने बड़े बदलाव को बरदाश्त करने के बाद। यह हड्डियाँ अभी पूरी तरह सिंकी तक नहीं हैं…।”

“किसने कह दिया तुम्हें मैं कौम का बदला आदमी से लेने बैठा हूँ”, बाऊजी अपनी छाती पर हाथ मारते हुए कहते, “अरे! मैं आदमी की बात करता हूँ… आदमी की… अपनी… मैं तुम्हें आदमी नहीं दीखता?… और यह कौम? …कौम कौन-सी चिड़िया का नाम है?… वह नाम लड़ने के लिए होता है- कौम का नाम।… सहने के लिए होता है आदमी-निपट नंगा, बेबस आदमी… देख नहीं रहा अपनी आँखों से।” बाऊजी उसके सामने तराजू उठाते रहने से पड़ गये गट्टों से भरे अपने हाथ फैला देते।

“कैसे भूल जाऊँ?… कौन-सी जन्नत मिल नहीं गयी है कि भूल जाऊँ… अरे! तुझे कालिज करवा रहा हूँ तो तू बड़ा चौधरी हो गया है… यह सारा जुबानी जमा-खर्च तू अपने पास रख… मुझे सिखा रहा है भूल जाओ… तेरे लिए मुमकिन है भूल जाना… वह तेरे सफ़र का एक हिस्सा है… मेरा नरक तो ज़िन्दगी के इसी टुकड़े पर खड़ा है… तू क्यों नहीं भूल जाता?… तू ही भूल जा एक छोटी-सी बात…”

“तो फिर कह दे”, भैया ने यह सब सुनते-सुनते अघाकर मुझे कहलवाया था, “मेरा फ़ैसला यदि घर का फैसला नहीं हो सकता तो यह घर मेरा नहीं है। मुझे ऐसा करने का अफ़सोस है पर…”

बीचवाला अगर बात को ही खा जाए तो बात-बात न रहकर पहाड़ हो जाती है, यह मेरी समझ में नहीं आया। बाऊजी को भैया से, भैया को बाऊजी से बचाती रही मैं। बहसें, बातें आमने-सामने की बन्द हो गयी थीं। बाऊजी मुझे सुनाकर कह देते थे जो उसे कहलाना होता था। वह मुझे कह देता था जो बाऊजी को पहुँचाना होता था और मैं सब-कुछ पेट में रख लेती थी। कुछ भी यथास्थान नहीं पहुँचता था- इसलिए पारस्परिक समझ का दायरा उतना-का-उतना ही रहता था। बाऊजी की खामोशी से भैया शायद उनके सहमत होने का अन्दाज लगाता रहा हो, और भैया के चुप रहने से बाऊजी के मन में बात के टल जाने का भ्रम बना रहता हो।

और जब एक दिन गुलेल के वार से घायल होकर नीचे आ पड़ने वाले पक्षी की तरह यह बात अचानक बाऊजी के सामने फेंकी गयी तो वह थर्रा गये, “बाऊजी, भैया अलग रहना चाहता है शादी करके।”

बाऊजी के चेहरे पर पहले तो एक परत अबूझ जिज्ञासा, फिर अपने ध्वस्त विश्वास को फेंके हुए काग़ज़ की तरह वापिस हाथ में लेते हुए बोले, “क्या अभी अड़ा हुआ है वह वहीं…?”

“जी..! बाऊजी!” कहते-कहते मुझे डर-सा लगा, पता नहीं किस बात का।

“क्यों? उसकी हिम्मत कहाँ गयी जो तुझसे कहलवाया है… उसके मुँह में रोड़े पड़े हैं क्या? गीदड़ की औलाद।”

“वह कहता है आपसे बहस करने का फायदा नहीं।”

“हाँ। फायदा तो नहीं… वह ज़ख्म बच्चू के अपने जिस्म पर नहीं पड़े न… नहीं तो पूछता… वह क्या जाने।”… उनकी आँखों के सामने एक तेज दौड़ता हुआ बवंडर फिर से घूम गया लगा। वह कुछ ठहरकर बोले, “अपनी माँ से पूछ लिया है उसने?”

“जी…”

वह ऐसे चौंके जैसे उनकी देह पर किसी ने जलता हुआ अंगारा रख दिया हो।

“हूँ…! वह भी तो नहीं कहती कि बेटे के साथ जाएगी…वहीं रहेगी जाकर…?”

जवाब माँगने के लिए उन्होंने यह सवाल नहीं किया था। जवाब उन्हें मालूम था…जवाब सुनने के लिए वह रुके भी नहीं। लेटे थे, उठकर इधर-उधर टहलना शुरू कर दिया।

इसके बाद तो चुप… भारी-सी चुप। चलते कदमों की तेज-धीमी खिसखिसाहट…बीच-बीच में रसोई में बर्तन खटकने और फूँकनी से चूल्हा फूँकने की माँ की आवाज़ और कड़ुआता हुआ धुँआ।

बीच में पसरे हुए ऐसे समय के खामोश तनाव को और किसी तरह तोड़ा नहीं जा सकता था।

“आपका खाना लाऊँ?”, मैंने पूछा।

“नहीं!” आवाज़ कडक़ थी, “तुम सब खा लो… सोओ… मुझे नहीं खाना… मुझे भूख नहीं है…।” आवाज़ पस्त थी।

इन दो सिरों के बीच की छोटी-सी ज़मीन पर इतना लम्बा सफ़र?

मुझे दर्द हुआ… धँसता-उधेड़ता दर्द… बाऊजी के लिए।

“आप खा लीजिए, बाऊजी, मैं उसे फिर से समझाऊँगी…समझा लूँगी।”

“तू क्या समझाएगी… और वह भी क्यों समझेगा… आख़िर यह मेरा इतिहास है, उसका नहीं… वह मेरे जख्म थे, उसके नहीं… यह दर्द भी मेरा ही है, बस मेरा… इसे मेरे आयाम में खड़ी मेरी हमसफ़र पीढ़ी ही समझ सकती है, मेरी भावी नहीं… जा! कह दे उससे…”

टहलते-टहलते वह धप्प से खाट पर बैठ गये थे। घुटनों पर कोहनियाँ टिकाकर अपना सिर उन्होंने अपनी दोनों हथेलियों में दे लिया था।

“कह दे जाकर उससे… कर ले शादी… ले ले मकान… किराये की फिकर न करे… मैं दे दूँगा किराया… कह देना यह भी, निपट-निपट कर जल्दी दुकान पर आये… मेरी बुड्ढी हड्डियों में अब…”

”माँ..!” मैंने बाऊजी की कितनी-कितनी ज़रूरतों को समझते हुए माँ को ज़ोर से पुकारा।

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