किस्मत और पुरुषार्थ

ऐ नाकामी तेरी औकात क्या है!
तू मुझे गिराये तेरी औकात क्या है!
मेरा मनोबल है हिमालय से ऊँचा!
तपाया है मैंने अपने ही लौ में!
दहकते हुए अंगारों पर पैदल चला हूँ!
मौत को मैंने मारा है उससे आगे निकल के!!

उपेक्षा के काँटों से निकला हूँ जब से!
उपेक्षा भी सिर अब झुकाये हुए है!
अपमान के सागर में नहाया हुआ था!
आज स्वतः प्रतिष्ठा मुझे सर बिठाये हुए है!!

इस संसार ने दिया क्या है मुझे!
चढ़ा सूली पर फिर से पूजा है मुझे!
ख्वाहिशों के पौधे बोये थे बचपन में!
जवानी में उनको सींचा है मैंने!

कभी कगज की पतंगों को उड़ाया था मैंने!
आज लोहे के खटोलों से खेला है मैंने!
सुना है मुकद्दर बनाता है मुकद्दर!
मुकद्दर को मैंने बनाया यहीं है!!

कभी था खड़ा मैं सड़क पर अकेला!
आज भीड़ को पीछे चलाया है मैंने!
ए ज़िन्दगी मेरी किस्मत को न आजमा!
किस्मत को अपने बनाया है मैंने!!