मथुरा कि नगर है आशिक़ी का
दम भरती है आरज़ू इसी का

हर ज़र्रा-ए-सर-ज़मीन-ए-गोकुल
दारा है जमाल-ए-दिलबरी का

बरसाना-ओ-नंद-गाँव में भी
देख आए हैं जल्वा हम किसी का

पैग़ाम-ए-हयात-ए-जावेदाँ था
हर नग़्मा-ए-कृष्ण बाँसुरी का

वो नूर सियाह या कि हसरत
सर-चश्मा फ़रोग़-ए-आगही का..

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