‘क्षमा करना जीजी’ – नरेन्द्र कोहली

आज सुबह “क्षमा करना जीजी” पढ़ना शुरू किया. यह नरेन्द्र कोहली लिखित सामाजिक उपन्यास है. यह अपने आप में कुछ अधिक महत्वपूर्ण इसलिए हो जाता है कि सामान्यतः नरेन्द्र कोहली पौराणिक उपन्यास लिखने के लिए जाने जाते हैं. हालाँकि अपने ज़ोनर से अलग इस उपन्यास को भी लेखक ने बहुत अच्छी तरह निभाया है. एक मध्यम वर्गीय या निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाला या फिर छोटे शहरों से आने वाला हर व्यक्ति इसे कहीं न कहीं अपने क़रीब पाएगा. हो सकता है यह हमारी या आपकी घटना नहीं हो लेकिन जिस मानसिकता का चित्रण करने का प्रयास किया गया है वो हम बहुत सहजता से अपने आस-पास देख पाते हैं या कम से कम आज से 15-20 साल पहले तो निश्चित तौर पर देख पाते थे. आज भी छोटे अथवा दूर दराज़ के शहरों में इस मानसिकता के निशान बहुत आसानी से मिल जाते हैं.

यह एक ऐसी स्त्री की कहानी है जिसके जीवन में बचपन से बहुत उथल-पुथल है. जिसमे आगे बढ़ने की, ऊँचाइयों को छूने की प्रबल संभावनाएं हैं और उसे जब-जब मौका मिला उसने इस बात को सच भी किया है. पढ़ाई में वो सदैव तेज़ रही है. उसके अन्दर विद्रोह है लेकिन आक्रोश का लेश मात्र नहीं है. उसके अन्दर अपने अभिन्दन की कोई भी आशा नहीं है. और उसके अन्दर वो सारे गुण भी, जिसकी अपेक्षा यह समाज, किसी भारतीय स्त्री से रखता है, मौजूद हैं. उसके अन्दर की जीजीविषा को भी लेखक कई जगह इशारों में रेखांकित करते हैं.

इन सारे गुणों के बावजूद बचपन से लेकर प्रौढ़ावस्था तक की उसकी जिंदगी में हमारे तथाकथित सामजिक मूल्यों के चलते उसे स्त्री होने का क़र्ज़ चुकाना पड़ता है. बचपन में “अगले घर जाना है” के नाम पर सौतेली दादी एक बच्ची की क्षमता से अधिक काम करवाती है. परिस्थितियां बदलती हैं, दादी से छुटकारा मिलता है तो किशोरावास्था में पढ़ाई जारी रखने या फिर नौकरी करने के लिए उसे अपने ही लोगों से झगड़ना पड़ता है. एक उम्र हो जाने के बाद और शादी होने तक अन्य लड़कियों की तरह ही एक-दो बार उसके चरित्र पर भी चिंता जताकर उसकी शादी की बात की जाती है और शादी के बाद उसे सब कुछ त्याग देना पड़ता है. पति आय से ठीक-ठाक लेकिन स्वभाव से बहुत अक्खड़ किस्म का इंसान मालूम होता है. वहां एक प्रकार की घुटन होने लगती है. हालाँकि उसका विद्रोही मन इस बात को स्वीकारता नहीं है लेकिन जब वो अपने पिता या बड़े भाइयों के पास सहायता के लिए जाती है तो सब अलग-अलग कारणों का हवाला देकर मदद के लिए आगे नहीं आते. अंततः वो अपने स्तर से इस मुश्किल से लड़ने का प्रयास करती है लेकिन कालांतर में वह कैंसर के रोग से मर जाती है.

इस कहानी की सबसे अच्छी बात इसकी तरलता है. इसमें बनावट जैसा कुछ नहीं लगता. यह बहुत सहजता से स्त्रियों की सामाजिक स्थिति पर बात करते हुए अपने अंत तक पहुँचती है. किसी भी परिस्थिति में भावनाओं का किसी भी प्रकार से अतिरेक नहीं दिखाया गया है. सामान्य स्थिति में सामजिक नीतियां (जिसे कुरीतियाँ भी कहा जा सकता है) जैसे हमारे घर में घुली हुई मिलतीं हैं और जिसका कई बार पता भी नहीं चलता, उसी प्रकार इस काहानी में भी यह बहुत सहज रूप से घुली हुई है जैसे इसकी मां या पिता का इसकी दादी के गलतियों पर भी नहीं बोलना मात्र इस वजह से कि वो उनसे बड़ी थीं.. लड़कियों के कम पढ़ने पर जोर देना बल्कि उनकी शादी को किसी भी तरह से प्रमुखता देना आदि-आदि.

पात्रों का चरित्र चित्रण भी गौर करने लायक है. पिता बहुत उग्र नहीं है, लेकिन सामजिक परिवेश से इतना घिरा है कि उसके बाहर सोच ही नहीं पाता और इस तरह वो कई बार नेगेटिव सा लगता है. माँ हमेसा नेपथ्य में रहीं है. पूरी कहानी जिस पात्र के चश्मे से दिख रही है, वो अपनी बहन से सबसे अधिक प्यार तो करता है लेकिन बहन के अधिकारों के लिए पूरी कहानी में हमेशा कोई दूसरा भाई लड़ता है. हमारे यहाँ के स्त्रियों के स्वास्थ्य पर वो ख़ुद भी ध्यान नहीं रखतीं और उसी तरह जीजी भी कैंसर का शिकार होकर ख़त्म हो जाती हैं. कई कम महत्वपूर्ण पात्र भी अपना काम बखूबी कर रहे हैं.

अगर आप स्त्रियों की सामजिक स्थिति को देखकर पीड़ा अनुभव करते हैं तो सामान्य गति से चलने वाली यह कहानी समाज के प्रति कई जगहों पर आपकी टीस, आपके आक्रोश, आपकी घृणा पर हलकी सी चोट करेगी, उसे छेड़ेगी, आपको सोचने पर मजबूर करेगी, हालांकि कहीं भी यह कहानी, विद्रोह करने या मोर्चा खोलने की बात नहीं करती. अंत होते-होते आप जीजी से इतना जुड़ाव महसूस करेंगे कि उनका अंत आपको कष्ट देगा.

इस उपन्यास का पहला संस्करण 1995 में है और लिखी कब गयी इसका अंदाज़ मुझे नहीं है लेकिन यह विभाजन का वक़्त क्यूँ दिखाती है यह समझ नहीं आता. मुझे विभाजन की त्रासदी का इस कहानी में कोई उपयोग नहीं दिखा, या ऐसा भी नहीं है कि स्त्रियों की यह दशा उस वक़्त ही हो सकती थी, बाद में नहीं. बल्कि आज भी बहुत जगहों पर स्त्रियों की दशा उससे भी ख़राब है जैसा कि दिखाया गया है. ये संभव है कि लेखक का जन्म 1940 में सियालकोट में हुआ है सो वो अपनी मातृभूमि की चर्चा का लोभ न छोड़ पाएं हों.

( पूरी कहानी पर हालाँकि मैं बहुत सटीक टिप्पणी नहीं कर सकता और इसके पीछे “भारतीय ज्ञानपीठ” जिसने इसे छापा है, की गलती है. इसकी वजह से भावनात्मक कहानी में अचानक से सस्पेंस आ जाता है. दरअसल हुआ यह कि 64वें पेज के बाद मुझे कहानी की सूरत अचानक से बदली हुई लगी, कई देर के बाद ये मालूम हुआ कि मैं 81वें पेज पर पहुँच गया. 65 से 80 पृष्ठ तक कहीं मिला ही नहीं. किसी के पास पूरी किताब हो तो…)

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Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

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