अमलतास, मैं गया वक़्त नहीं हूँ, उपस्थिति, स्मृतिचिह्न

अमलतास

हथेली पर रखा अमलतास महकता है, तुम-सा
तुमने तो कहा था कि ये मौसमी फूल है और खिलता है मौसम भर
महकता भी सिर्फ़ मौसम भर
पीला खूब पीला – जैसे तुम्हारी हँसी
क्या तुम ही अमलतास हो?

मैं गया वक़्त नहीं हूँ

जब साँसें थकीं, उन्होंने पुकारा उसी उनींदी, चीन्ही, प्रेम पगी आवाज में तुम्हारा नाम..

क्या तुम उस शाम सिगरेट के कश और बीयर के गिलास पर अलसायी आवाज़ में नहीं बोले थे? – “मैं गया वक़्त नहीं हूँ कि फिर आ ही ना सकूँ, जब चाहे बुला लेना!”

कहाँ हो तुम? छप्पन घंटे तो हो गए पुकारे!

उपस्थिति

मेरे जीवन में तुम्हारी उपस्थिति को नकारते हुए बढ़ जाती हूँ मैं आगे
और गिर जाता है पीछे, मन का एक हिस्सा, फिर उसके पीछे दूसरा…
डोमिनोज़ इफ़ेक्ट, यू नो!

स्मृतिचिह्न

काश कि, अगर मैं मिटा पाता तुम्हें मेरे स्मृति चिह्नों से,
ठीक उसी तरह, जैसे मैंने मिटाया था,
तुम्हारा नाम!

~र