कुँअर बेचैन हिन्दी की वाचिक परम्परा के प्रख्यात कवि हैं, जो अपनी ग़ज़लों, गीतों व कविताओं के ज़रिए सालों से हिन्दी श्रोताओं के बीच एक खास स्थान रखते आए हैं। शब्दों की गेयता के साथ भावनाओं की संगत कुँअर बेचैन की कविताओं में देखते ही बनती है। आज पोषम पा पर पढ़िए उनकी कुछ कविताएँ जिसमें उन्होंने एक घर और उस घर में रहने वाले विभिन्न रिश्तों को कविताओं में उकेर दिया है।

घर

घर
कि जैसे बाँसुरी का स्वर
दूर रह कर भी सुनाई दे।
बंद आँखों से दिखाई दे।

दो तटों के बीच
जैसे जल
छलछलाते हैं
विरह के पल

याद
जैसे नववधू, प्रिय के-
हाथ में कोमल कलाई दे।

कक्ष, आंगन, द्वार
नन्हीं छत
याद इन सबको
लिखेगी ख़त

आँख
अपने अश्रु से ज़्यादा
याद को अब क्या लिखाई दे।


माँ

माँ!
तुम्हारे सज़ल आँचल ने
धूप से हमको बचाया है।
चाँदनी का घर बनाया है।

तुम अमृत की धार प्यासों को
ज्योति-रेखा सूरदासों को
संधि को आशीष की कविता
अस्मिता, मन के समासों को

माँ!
तुम्हारे तरल दृगजल ने
तीर्थ-जल का मान पाया है
सो गए मन को जगाया है।

तुम थके मन को अथक लोरी
प्यार से मनुहार की चोरी
नित्य ढुलकाती रहीं हम पर
दूध की दो गागरें कोरी

माँ!
तुम्हारे प्रीति के पल ने
आँसुओं को भी हँसाया है
बोलना मन को सिखाया है।


पिता

ओ पिता,
तुम गीत हो घर के
और अनगिन काम दफ़्तर के।

छाँव में हम रह सकें यूँ ही
धूप में तुम रोज़ जलते हो
तुम हमें विश्वास देने को
दूर, कितनी दूर चलते हो

ओ पिता,
तुम दीप हो घर के
और सूरज-चाँद अंबर के।

तुम हमारे सब अभावों की
पूर्तियाँ करते रहे हँसकर
मुक्ति देते ही रहे हमको
स्वयं दुख के जाल में फँसकर

ओ पिता,
तुम स्वर, नए स्वर के
नित नये संकल्प निर्झर के।


पत्नी

तू मेरे घर में बहनेवाली एक नदी
मैं नाव
जिसे रहना हर दिन
बाहर के रेगिस्तानों में।

नन्हीं बेसुध लहरों को तू
अपने आँचल में पाल रही
उनको तट तक लाने को ही
तू अपना नीर उछाल रही

तू हर मौसम को सहनेवाली एक नदी
मैं एक देह
जो खड़ी रही आँधी, वर्षा, तूफ़ानों में।

इन गर्म दिनों के मौसम में
कितनी कृश कितनी क्षीण हुई।
उजली कपास-सा चेहरा भी
हो गया कि जैसे जली रुई

तू धूप-आग में रहनेवाली एक नदी
मैं काठ
सूखना है जिसको
इन धूल भरे दालानों में।

तेरी लहरों पर बहने को ही
मुझे बनाया कर्मिक ने
पर तेरे-मेरे बीच रेख-
खींची रोटी की, मालिक ने

तू चंद्र-बिंदु के गहनेवाली एक नदी
मैं सम्मोहन
जो टूट गया
बिखरा फिर नई थकानों में।


पुत्र

पुत्र।
तुम उज्जवल, भविष्यत् फल।
हम तुम्हारे आज हैं, लेकिन-
तुम हमारे आज के शुभ कल।
पुत्र, तुम उज्ज्वल भविष्यत् फल।

तुम हमारे मौन स्वर की भी
मधुमयी, मधु छंदमय भाषा
तुम हमारी हृदय-डाली के
फूल की मुस्कान, परिभाषा

झील हम, तो तुम नवल उत्पल।
पुत्र, तुम उज्ज्वल भविष्यत् फल।

तुम हमारे प्यार का सपना
तुम बढ़े तो क़द बढ़ा अपना
छाँव यदि मिलती रही तुमको
तो हमें अच्छा लगा तपना

हर समस्या का सरल-सा हल।
पुत्र, तुम उज्ज्वल भविष्यत् फल।


बंधु

बंधु।
हम-तुम प्रिय महकते फूल
गेह-तरु की नेह-डाली के।

हम पिता की आँख के सपने
और माँ की आँख के मोती
प्रिय बहन के मन-निलय में भी
रोशनी हम बिन नहीं होती

बंधु।
हम-तुम प्रिय महकते फूल
एक पूजा-सजी थाली के।

एक ही शुभ गीत के प्रिय स्वर
एक ही प्रिय शब्द के अक्षर
हैं उड़ानों की लयें जिनमें
एक पक्षी के सुभग दो पर

बंधु।
हम-तुम महकते फूल
एक क्यारी, एक माली के।

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