ललित निबन्ध: ‘कुटज’ – हजारीप्रसाद द्विवेदी

कहते हैं, पर्वत शोभा-निकेतन होते हैं। फिर हिमालय का तो कहना ही क्‍या। पूर्व और अपार समुद्र – महोदधि और रत्‍नाकर – दोनों को दोनों भुजाओं से थाहता हुआ हिमालय ‘पृथ्‍वी का मानदंड’ कहा जाय तो गलत क्‍यों है? कालिदास ने ऐसा ही कहा था। इसी के पाद-देश में यह जो श्रृंखला दूर तक लोटी हुई है, लोग इसे ‘शिवालिक’ श्रृंखला कहते हैं। ‘शिवालिक’ का क्‍या अर्थ है? ‘शिवालक’ या शिव के जटाजूट का निचला हिस्‍सा तो नहीं है? लगता तो ऐसा ही है। शिव की लटियायी जटा ही इतनी सूखी, नीरस और कठोर हो सकती है। शिव की लटियायी जटा ही इतनी सूखी, नीरस और कठोर हो सकती है। वैसे, अलकनंदा का स्रोत यहाँ से काफी दूरी पर हैं, लेकिन शिव का अलक तो दूर-दूर तक छितराया ही रहता होगा। संपूर्ण हिमालय को देखकर ही किसी के मन में समाधिस्‍य महादेव की मूर्ति स्‍पष्‍ट हुई होगी। उसी समाधिस्‍य महोदव के अलक-जाल के निचले हिस्‍से का प्रतिनिधित्‍व यह गिरि श्रृंखला कर रही होगी। कहीं-कहीं अज्ञात नाम-गोत्र झाड़-झंखाड़ और बेहया-से पेड़ खड़े दिख अवश्‍य जाते हैं, पर और कोई हरियाली नहीं। दूब तक सूख गई है। काली-काली चट्टानों और बीच-बीच में शुष्‍कता की अंतर्निरुद्ध सत्ता का इजहार करनेवाली रक्‍ताभ रेती। रस कहाँ है? ये जो ठिंगने-से लेकिन शानदार दरख्‍त गर्मी भी भयंकर मार खा-खाकर और भूख-प्‍यास की निरंतर चोट सह-सहकर भी जी रहे हैं, इन्‍हें क्‍या कहूँ? सिर्फ जी ही नहीं रहे है, हँस भी रहे हैं। बेहया हैं क्‍या? या मस्‍तमौला हैं? कभी-कभी जो लोग ऊपर से बेहया दिखते हैं, उनकी जड़ें काफी गहरे पैठी रहती हैं। ये भी पाषाण की छाती फाड़कर न जाने किस अतल गह्वर से अपना भोग्‍य खींच लाते हैं।

शिवालिक की सूखी नीरस पहाड़ियों पर मुस्‍कराते हुए ये वृक्ष द्वंद्वातीत हैं, अलमस्‍त हैं। मैं किसी का नाम नहीं जानता, कुछ नहीं जानता, शील नहीं जानता, पर लगता है, ये जैसे मुझे अनादि काल से जानते हैं। इन्‍हीं में एक छोटा-सा बहुत ही ठिंगना पेड़ है, पत्ते चौड़े भी हैं, बड़े भी हैं। फूलों से तो ऐसा लदा हैं कि कुछ पूछिए नहीं। अजब सी अदा है। मुस्‍कराता जान पड़ता है। लगता है, पूछ रहा है कि क्‍या तुम मुझे भी नहीं पहचानते? पहचानता तो हूँ, अवश्‍य पहचानता हूँ। लगता है, बहुत बार देख चुका हूँ। पहचानता हूँ उजाड़ के साथी, तुम्‍हें अच्‍छी तरह पहचानता हूँ। नाम भूल रहा हूँ। प्रायः जाता हूँ। रूप देखकर प्रायः पहचान जाता हूँ, नाम नहीं याद आता। पर नाम ऐसा है कि जब तक रूप के पहले ही हाजिर न हो जाय तब तक रूप की पहचान अधूरी रह जाती है। भारतीय पंडितों का सैकड़ों बार का कचारा-निचोड़ा प्रश्‍न सामने आ गया, रूप मुख्‍य है या नाम? नाम बड़ा है या रूप? पद पहले है या पदार्थ? पदार्थ सामने है, पद नहीं सूझ रहा है। मन व्‍याकुल हो गया, स्‍मृतियों के पंख फैलाकर सुदूर अतीत के कोनों में झाँकता रहा। सोचता हूँ, इसमें व्‍याकुल होने की क्‍या बात है? नाम से क्‍या रखा है – हृटस देअर इन ए नेम। नाम की जरूरत ही हो तो सौ दिए जा सकते हैं। सुस्मिता, गिरिकांता, वनप्रभा, शुभ्रकिरीटिनी, मदोद्धता, विजितातपा, अलकाबतंसा, बहुत-से नाम हैं। या फिर पौरुष-व्‍यंजक नाम भी दिए जा सकते हैं – अकुतोभय, गिरिगौरव, कूटोल्‍लास, अपराजित, धरतीधकेल, पहाड़-फोड़, पातालभेद। पर मन नहीं मानता। नाम इसलिए बड़ा नहीं है कि वह नाम है। वह इसलिए बड़ा होता है कि उसे सामाजिक स्‍वीकृति मिली होती है। रूप व्‍यक्ति सत्‍य है, नाम समाज सत्‍य। नाम उस पद को कहते हैं जिस पर समाज की मुहर लगी होती है, आधुनिक शिक्षित लोग जिसे ‘सोशल सैंक्‍सन’ कहा करते हैं। मेरा मन नाम के लिए व्‍याकुल है, समाज द्वारा स्‍वीकृत, इतिहास द्वारा प्रमाणित, समष्टि मानव की चित्त गंगा में स्‍नात।

इस गिरिकूट-बिहारी का नाम क्‍या है? मन दूर-दूर तक उड़ रहा है – देश में और काल में… मनोरथानामगतिनैविद्यते। अचानक याद आया – अरे, यह तो कुटज है। संस्‍कृत साहित्‍य का बहुत परिचित, किंतु कवियों द्वारा अवमानित, यह छोटा-सा शानदार वृक्ष ‘कूटज’ है। ‘कूटज’ कहा गया होता तो कदाचित ज्‍यादा अच्‍छा होता। पर नाम इसका चाहे कुटज ही हो, विश्‍व तो निःसंदेह ‘कूटज’ होगा। गिरिकूट पर उत्‍पन्‍न होनेवाले इस वृक्ष को ‘कूटज’ कहने में विशेष आनंद मिलता है। बहरहाल, यह कूटज-कुटज है, मनोहर कुसुम र्स्‍तबकों से झबराया, उल्‍लास लोल चारुस्मित कुटज। जी भर आया। कालिदास ने ‘आषाढ़स्‍य प्रथम दिवसे’ रामगिरि‍ पर यक्ष को जब मेघ की अभ्‍यर्थना के लिए नियोजित किया तो कंबख्‍त को ताजे कुटज पुष्‍पों की अंजलि देकर ही संतोष करना पड़ा – चंपक नहीं, बकुल नहीं, नीलोत्‍पल नहीं, मल्लिका नहीं, अ‍रविंद नहीं – फकत कुटज के फूल। यह और बात है कि आज आषाढ़ का नहीं, जुलाई का पहला दिन है। मगर फर्क भी कितना है। बार-बार मन विश्‍वास करने को उतारू हो जाता है कि यक्ष बहाना मात्र है, कालिदास ही कभी ‘शापेनास्‍तंगमितमहिमा’ होकर रामगिरि पहुँचे थे, अपने ही हाथों इस कुटज पुष्‍प का अर्ध्‍य देकर उन्‍होंने मेघ की अभ्‍यर्थना की थी। शिवालिक की इस अनत्‍युच्‍च पर्वत-श्रृंखला की भाँति रामगिरि‍ पर भी उस समय और कोई फूल नहीं मिला होगा। कुटज ने उनके संतप्‍त चित्त को सहारा दिया था – बड़भागी फूल है यह। धन्‍य हो कुटज, तुम ‘गाढ़े के साथी’ हो। उत्तर की ओर सिर उठाकर देखता हूँ, सुदूर तक ऊँची काली पर्वत-श्रृंखला छायी हुई है और एकाध सफेद बादल के बच्‍चे उससे लिपटे खेल रहे हैं। मैं भी इन पुष्‍पों का अर्ध्‍य उन्‍हें चढ़ा दूँ? पर काहे वास्‍ते? लेकिन बुरा भी क्‍या है?

कुटज के ये सुंदर फूल बहुत बुरे तो नहीं हैं। जो कालिदास के काम आया हो उसे ज्‍यादा इज्‍जत मिलनी चाहिए। मिली कम है। पर इज्‍जत तो नसीब की बात है। रहीम को मैं बड़े आदर के साथ स्‍मरण करता हूँ। दरियादिल आदमी थे, पाया सो लुटाया। लेकिन दुनिया है कि मतलब से मतलब है, रस चूस लेती है, छिलका और गुठली फेंक देती है। सुना है, रस चूस लेने के बाद रहीम को भी फेंक दिया गया था। एक बादशाह ने आदर के साथ बुलाया, दूसरे ने फेंक दिया। हुआ ही करता है। इससे रहीम का मोल घट नहीं आता। उनकी फक्‍कड़ाना मस्‍ती कहीं गई नहीं। अच्‍छे भले कद्रदान थे। लेकिन बड़े लोगों पर भी कभी-कभी ऐसी वितृष्‍णा सवार होती है कि गलती कर बैठते हैं। मन खराब रहा होगा, लोगों की बेरुखी और बेकद्रदानी से मुरझा गए होंगे – ऐसी ही मनःस्थिति में उन्‍होंने बिचारे कुटज को भी एक चपत लगा दी। झुँझलाए थे, कह दिया :

ये रहीम कब बिरछ कँह, जिनकर छाँह गँभीर,
बागन बिच-बिच देखियत, सेंहुड़ कुटज करीर।

गोया कुटज अदना-सा ‘बिरछ’ हो। ‘छाँह’ ही क्‍या बड़ी बात है, फूल क्‍या कुछ भी नहीं? छाया के लिए न सही, फूल के लिए तो कुछ सम्‍मान होना चाहिए। मगर कभी-कभी कवियों का भी ‘मूड’ खराब हो जाया करता है। वे भी गलत-बयानी के शिकार हो जाया करते हैं। फिर बागों से गिरिकूट-बिहारी कुटज का क्‍या तुक है?

कुटज अर्थात् जो कुट से पैदा हुआ हो। ‘कुट’ घड़े को भी कहते हैं, घर को भी कहते हैं। कुट अर्थात् घड़े से उत्‍पन्‍न होने के कारण प्रतापी अगस्‍त्‍य मुनि भी ‘कुटज’ कहे जाते हैं। घड़े से तो क्‍या उत्‍पन्‍न हुए होंगे। कोई और बात होगी। संस्‍कृत में ‘कुटहारिका’ और ‘कुटकारिका’ दासी को कहते हैं। क्‍यों कहते हैं? ‘कुटिया’ या ‘कुटीर’ शब्‍द भी कदाचित् इसी शब्‍द से संबद्ध हैं। क्‍या इस शब्‍द का अर्थ घर पर ही है? घर में काम-काज करनेवाली दासी कुटकारिका और कुटहारिका कही ही जा सकती हैं। एक जरा गलत ढंग की दासी ‘कुटनी’ भी कही जाती है। संस्‍कृत में उसकी गलतियों को थोड़ा अधिक मुखर बनाने के लिए उसे ‘कुट्टनी’ कह दिया गया है। अगस्‍त्‍य मुनि भी नारदजी की तरह दासी के पुत्र थे क्‍या? घड़े में पैदा होने का तो कोई तुक नहीं है, न मुनि कुटज के सिलसिले में, न फूल कुटज के। फूल गमले में होते अवश्‍य हैं, पर कुटज तो जंगल का सैलानी है। उसे घड़े या गमले से क्‍या लेना-देना? शब्‍द विचारोत्तेजक अवश्‍य है। कहाँ से आया? मुझे तो इसी में संदेह है कि यह आर्यभाषाओं का शब्‍द है भी या नहीं। एक भाषाशास्‍त्री किसी संस्‍कृत शब्‍द को एक से अधिक रूप में प्रचलित पाते थे तो तुरंत उसकी कुलीनता पर शक कर बैठते थे। संस्‍कृत में ‘कुटज’ रूप भी मिलता है और ‘कुटच’ भी। मिलने को तो ‘कुटज’ भी मिल जाता है। तो यह शब्‍द किस जाति का है? आर्य जाति का तो नहीं जान पड़ता। सिलवाँ तेवी कह गए हैं कि संस्‍कृत भाषा में फूलों, वृक्षों और खेती बागवानी के अधिकांश शब्‍द आग्‍नेय भाषा-परिवार के हैं। यह भी वहीं का तो नहीं है? एक जमाना था जब आस्‍ट्रेलिया और एशिया के महाद्वीप मिले हुए थे, फिर कोई भयंकर प्राकृतिक विस्‍फोट हुआ और ये दोनों अलग हो गए। उन्‍नीसवीं शताब्‍दी के भाषा-विज्ञानी पंडितों को यह देखकर आश्‍चर्य हुआ कि आस्‍ट्रेलिया के सुदूर जंगलों में बसी जातियों की भाषा एशिया में बसी हुई कुछ जातियों की भाषा से संबद्ध है। भारत की अनेक जातियाँ वह भाषा बोलती हैं जिनमें संथाल, मुंडा आदि भी शामिल हैं। शुरू-शुरू में इस भाषा का नाम आस्‍ट्रो-एशियाटिक दिया गया था। दक्षिण पूर्व या अग्निकोण की भाषा होने के कारण इसे आग्‍नेय-परिवार भी कहा जाने लगा है। अब हम लोग भारतीय जनता के वर्ग-विशेष को ध्‍यान में रखकर और पुराने साहित्‍य का स्‍मरण करके इसे कोल-परिवार की भाषा कहने लगे हैं। पंडितों ने बताया हैं कि संस्‍कृत भाषा के अनेक शब्‍द, जो अब भारतीय संस्‍कृति के अविच्‍छेद्य अंग बन गए हैं, इसी श्रेणी की भाषा के हैं। कमल, कुड्मल, कंबु, कंबल, तांबूल आदि शब्‍द ऐसे ही बताए जाते हैं। पेड़-पौधों, खेती के उपकरणों और औजारों के नाम भी ऐसे ही हैं। ‘कुटज’ भी हो तो क्‍या आश्‍चर्य? संस्‍कृत भाषा ने शब्‍दों के संग्रह में कभी छूत नहीं मानी। न जाने किस-किस नस्‍ल के कितने शब्‍द उसमें आकर अपने बन गए हैं। पंडित लोग उसकी छाल-बीन करके हैरान होते हैं। संस्‍कृत सर्वग्रासी भाषा है।

यह जो मेरे सामने कुटज का लहराता पौधा खड़ा है वह नाम और रूप दोनों में अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा कर रहा है। इसीलिए यह इतना आकर्षक है। नाम है कि हजारों वर्ष से जीता चला आ रहा है। कितने नाम आए और गए। दुनिया उनको भूल गई, वे दुनिया को भूल गए। मगर कुटज है कि संस्‍कृत की निरंतर स्‍फीयमान शब्‍दराशि में जो जमके बैठा सो बैठा ही है। और रूप की तो बात ही क्‍या है। बलिहारी है इस मादक शोभा की। चारों ओर कुपित यमराज के दारुण निःश्‍वास के समान धधकती लू में यह हरा है और भरा भी है, दुर्जन के चित्त से भी अधिक कठोर पाषाण की कारा में रुद्ध अज्ञात जलस्रोत से बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है और मूर्ख के मस्तिष्‍क से भी अधिक सूने गिरि कांतार में भी ऐसा मस्‍त बना है कि ईर्ष्‍या होती है। कितनी कठिन जीवनी-शक्ति है। प्राण ही प्राण को पुलकित करता है, जीवनी-शक्ति ही जीवनी शक्ति को प्रेरणा देती है। दूर पर्वतराज हिमालय की हिमाच्‍छादित चोटियाँ है, वहीं कहीं भगवान महादेव समाधि लगाकर बैठे होंगे, नीचे सपाट पथरीली जमीन का मैदान है, कहीं-कहीं पर्वतनंदिनी सरिताएँ आगे बढ़ने का रास्‍ता खोज रही होंगी – बीच में यह चट्टानों की ऊबड़-खाबड़ जटाभूमि है – सूखी, नीरस, कठोर। यहीं आसन मारकर बैठे हैं मेरे चिरपरिचित दोस्‍त कुटज। एक बार अपने झबरीले मूर्धा को हिलाकर समाधिनिष्‍ठ महादेव को पुष्‍पस्‍तबक का उपहार चढ़ा देते हैं और एक बार नीचे की ओर अपनी पाताल भेदी जड़ों को दबाकर गिरि‍नंदिनी सरिताओं को संकेत से बता देते हैं कि रस का स्रोत कहाँ है। जीना चाहते हो? कठोर पाषाण को भेदकर, पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्‍य संग्रह करो, वायुमंडल को चूसकर, झंझा-तूफान को रगड़कर, अपना प्राप्‍य वसूल लो, आकाश को चूमकर, अवकाश की लहरी में झूमकर, उल्‍लास खींच लो। कुटज का यही उपदेश है :

भित्‍वा पाषाणपिठरं छित्‍वा प्राभन्‍जनीं व्‍यथाम्पी
त्‍वा पातालपानीयं कुटजश्‍चुम्‍बते नभ:।

दुरंत जीवन शक्ति है। कठिन उपदेश है। जीना भी एक कला है। लेकिन कला ही नहीं, तपस्‍या है। जियो तो प्राण ढाल दो जिंदगी में, मन ढाल दो जीवन रस के उपकरणों में। ठीक है। लेकिन क्‍यों? क्‍या जीने के लिए जीना ही बड़ी बात है? सारा संसार अपने मतलब के लिए ही तो जी रहा है। याज्ञवल्‍क्‍य बहुत बड़े ब्रह्मवादी ऋषि थे। उन्‍होंने अपनी पत्‍नी को विचित्र भाव से समझाने की कोशिश की कि सब कुछ स्‍वार्थ के लिए है। पुत्र के लिए पुत्र प्रिय नहीं होता, पत्‍नी के लिए पत्‍नी प्रिया नहीं होती – सब अपने मतलब के लिए प्रिय होते हैं – ‘आत्‍मनस्‍तु कामाय सर्व प्रियं भवति।’ विचित्र नहीं है यह कर्त? संसार में जहाँ कहीं प्रेम है, सब मतलब के लिए। सुना है, पश्चिम के हॉब्‍स और हेल्‍वेशियस जैसे विचारकों ने भी ऐसी ही बात कही है। सुन के हैरानी होती है। दुनिया में त्‍याग नहीं है, प्रेम नहीं है, परार्थ नहीं है, परमार्थ नहीं है – है केवल प्रचंड स्‍वार्थ। भीतर की जिजीविषा – जीते रहने की प्रचंड इच्‍छा – ही अगर बड़ी बात हो तो फिर यह सारी बड़ी-बड़ी बोलियाँ, जिनके बल पर दल बनाए जाते हैं, शत्रुमर्दन का अभिनय किया जाता है, देशोद्धार का नारा लगाया जाता है, साहित्‍य और कला की महिमा गाई जाती है, झूठ हैं। इसके द्वारा कोई-न-कोई अपना बड़ा स्‍वार्थ सिद्ध करता है। लेकिन अंतरतर से कोई कह रहा है, ऐसा सोचना गलत ढंग से सोचना है। स्‍वार्थ से भी बड़ी कोई-न-कोई बात अवश्‍य है, जिजीविषा से भी प्रचंड कोई-न-कोई शक्ति अवश्‍य है। क्‍या है?

याज्ञवल्‍क्‍य ने जो बात धक्‍कामार ढंग से कह दी थी वह अंतिम नहीं थी। वे ‘आत्‍मन – ‘ का अर्थ कुछ और बड़ा करना चाहते थे। व्‍यक्ति का ‘आत्‍मा’ केवल व्‍यक्ति तक सीमित नहीं है, वह व्‍यापक है। अपने में सब और सबमें आप – इस प्रकार की एक समष्टि बुद्धि जब तक नहीं आती तब तक पूर्ण सुख का आनंद भी नहीं मिलता। अपने-आपको दलित द्राक्षा की भाँति निचोड़कर जब तक ‘सर्व’ के लिए निछावर नहीं कर दिया जाता तब तक ‘स्‍वार्थ’ खंड सत्‍य है, वह मोह को बढ़ावा देता है, तृष्‍णा को उत्‍पन्‍न करता है और मनुष्‍य को दयनीय-कृपण-बना देता है। कार्पण्‍य दोष से जिसका स्‍वभाव उपहत हो गया है, उसकी दृष्टि म्‍लान हो जाती है। वह स्‍पष्‍ट नहीं देख पाता। वह स्‍वार्थ भी नहीं समझ पाता, परमार्थ तो दूर की बात है।

कुटज क्‍या केवल जी रहा है? वह दूसरे के द्वार पर भीख माँगने नहीं जाता, कोई नि‍कट आ गया तो भय के मारे अधमरा नहीं हो जाता, नीति और धर्म का उपदेश नहीं देता फिरता, अपनी उन्‍नति के लिए अफसरों का जूता नहीं चाटता फिरता, दूसरों को अवमानित करने के लिए ग्रहों की खुशामद नहीं करता, आत्‍मोन्‍नति के हेतु नीलम नहीं धारण करता, अँगूठियों की लड़ी नहीं पहनता, दाँत नहीं निपोरता, बगलें नहीं झाँकता। जीता है और शान से जीता है – कोई वास्‍ते, किस उद्देश्‍य से? कोई नहीं जानता। मगर कुछ बड़ी बात है। स्‍वार्थ के दायरे से बाहर की बात है। भीष्‍म पितामह की भाँति अवधूत की भाषा में कह रहा है : ‘चाहे सुख हो या दुख, प्रिय हो या अप्रिय, जो मिल जाय उसे शान के साथ, हृदय से बिल्‍कुल अपराजित होकर, सोल्‍लास ग्रहण करो। हार मत मानो।’

सुखं वा यदि वा दुखं प्रियं वा यदि वाऽप्रियम्।
प्राप्‍तं प्राप्‍तमुपासीत हृदयेनापराजितः। (शांतिपर्व, 25/26)

हृदयेनापराजितः। कितना विशाल वह हृदय होगा जो सुख से, दुख से, प्रिय से, अप्रिय से विचलित न होता होगा। कुटज को देखकर रोमांच हो आता है। कहाँ से मिली है यह अकुतोभया वृत्ति, अपराजित स्‍वभाव, अविचल जीवन-दृष्टि।

जो समझता है कि वह दूसरों का उपकार कर रहा है वह अबोध है, जो समझता है कि दूसरे उसका अपकार कर रहे हैं वह भी बुद्धिहीन है। कौन किसका उपकार करता है, कौन किसका अपकार कर रहा है? मनुष्‍य जी रहा है, केवल जी रहा है, अपनी इच्‍छा से नहीं, इतिहास विधाता की योजना के अनुसार। किसी की उससे सुख मिल जाय, बहुत अच्‍छी बात है, नहीं मिल सका, कोई बात नहीं, परंतु उसे अभिमान नहीं होना चाहिए। सुख पहुँचाने का अभिमान यदि गलत है, तो दुख पहुँचाने का अभिमान तो नितांत गलत है।

दुख और सुख तो मन के विकल्‍प हैं। सुखी वह है जिसका मन वश में है, दुखी वह है जिसका मन परवश है। परवश होने का अर्थ है खुशामद करना, दाँत निपोरना, चाटुकारिता, हाँ-हजूरी। जिसका मन अपने वश में नहीं है वही दूसरे के मन का छंदावर्तन करता है, अपने को छिपाने के लिए मिथ्‍या आडंबर रचता है, दूसरों को फँसाने के लिए जाल बिछाता है। कुटज इन सब मिथ्‍याचारों से मुक्‍त है। वह वशी है। वह वैरागी है। राजा जनक की तरह संसार में रहकर, संपूर्ण भोगों को भोगकर भी उनसे मुक्‍त है। जनक की ही भाँति वह घोषणा करता है : ”मैं स्‍वार्थ के लिए अपने मन को सदा दूसरे के मन में घुसाता नहीं फिरता, इसलिए मैं मन को जीत सका हूँ उसे वश में कर सका हूँ’ :

नाहमात्‍मार्थमिच्‍छामि मनोनित्‍यं मनोन्‍तरे।
मनो से निर्जितं तस्‍मात् वशे तिष्‍ठति सर्वदा।

कुटज अपने मन पर सवारी करता है, मन को अपने पर सवार नहीं होने देता। मनस्‍वी मित्र, तुम धन्‍य हो।

■■■

यह भी देखें:

IGNOU MA (हिन्दी) – Study Material


Posham Pa

भाषाओं को भावनाओं को आपस में खेलना पोषम-पा चाहिए खेलती हैं चिड़िया-उड़..।

Leave a Reply

Related Posts

निबन्ध | Essay

खड़ी बोली में प्रथम सफल कविता आप ही कर सके हैं।

‘कविवर श्री सुमित्रानन्दन पन्त’ – सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ “मग्न बने रहते हैं मोद में विनोद में क्रीड़ा करते हैं कल कल्पना की गोद में, सारदा के मन्दिर में सुमन चढ़ाते हैं प्रेम का ही पुण्यपाठ Read more…

निबन्ध | Essay

‘आचरण की सभ्यता’ – सरदार पूर्ण सिंह

‘आचरण की सभ्यता’ – सरदार पूर्ण सिंह विद्या, कला, कविता, साहित्‍य, धन और राजस्‍व से भी आचरण की सभ्‍यता अधिक ज्‍योतिष्‍मती है। आचरण की सभ्‍यता को प्राप्‍त करके एक कंगाल आदमी राजाओं के दिलों पर Read more…

निबन्ध | Essay

‘जी’ – बालकृष्ण भट्ट

‘जी’ – बालकृष्ण भट्ट साधारण बातचीत में यह जी भी जी का जंजाल सा हो रहा है। अजी बात ही चीत क्‍या जहाँ और जिसमें देखो उसी में इस जी से जीते जी छुटकारा नहीं Read more…

error:
%d bloggers like this: