‘क्या कहें उनसे बुतों में हमने क्या देखा नहीं’ – बहादुर शाह ज़फ़र

क्या कहें उनसे बुतों में हमने क्या देखा नहीं
जो यह कहते हैं सुना है, पर ख़ुदा देखा नहीं

ख़ौफ़ है रोज़े-क़यामत का तुझे इस वास्ते
तूने ऐ ज़ाहिद!1 कभी दिन हिज्र का देखा नहीं

तू जो करता है मलामत2 देखकर मेरा ये हाल
क्या करूँ मैं तूने उसको नासिहा3 देखा नहीं

हम नहीं वाक़िफ़ कहाँ मसज़िद किधर है बुतकदा4
हमने इस घर के सिवा घर दूसरा देखा नहीं

चश्मपोशी5 दीदा-ओ-दानिस्ता6 की है ऐ ज़फ़र
वरना उसने अपने दर पर तुमको क्या देखा नहीं..

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1- धर्म परायण व्यक्ति; 2- धिक्कार; 3- उपदेशक; 4- मन्दिर; 5- आँख बचाना; 6- जान बूझ कर