क्यों इन तारों को उलझाते?

क्यों इन तारों को उलझाते?
अनजाने ही प्राणों में क्यों
आ-आकर फिर जाते?

पल में रागों को झंकृत कर,
फिर विराग का अस्फुट स्वर भर,
मेरी लघु जीवन वीणा पर
क्या यह अस्फुट गाते?

लय में मेरा चिर करुणा-धन
कम्पन में सपनों का स्पन्दन
गीतों में भर चिर सुख, चिर दुख
कण-कण में बिखराते!

मेरे शैशव के मधु में घुल
मेरे यौवन के मद में ढुल
मेरे आँसू स्मित में हिल-मिल
मेरे क्यों न कहाते?