क्यों मुझे प्रिय हों न बन्धन

क्यों मुझे प्रिय हों न बन्धन!

बन गया तम-सिन्धु का, आलोक सतरंगी पुलिन सा,
रजभरे जग-बाल से है, अंक विद्युत् का मलिन-सा,
स्मृति-पटल पर कर रहा अब,
वह स्वयं निज रूप अंकन!

चाँदनी मेरी अमा का भेंटकर अभिषेक करती,
मृत्यु जीवन के पुलिन दो आज जागृति एक करती,
हो गया अब दूत प्रिय का
प्राण का सन्देश-स्पन्दन!

सजनि मैंने स्वर्ण-पिंजर में प्रलय का वात पाला,
आज पुंजीभूत तम को कर बना डाला उजाला,
तूल से उर में समा कर
हो रही नित ज्वाल चन्दन!