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लड्डू और आत्मबोध

‘लड्डू और आत्मबोध’ – शोभिता श्रीवास्तव ‘दिव्या’

पूरा एक घंटा हुआ वो लड्डू का टुकड़ा जो मेरे में मुँह में गया था मुँह में ही रहा, गले से नीचे उतरने का नाम नहीं ले रहा था। बस उसकी खुशी और मन के उत्साह के साथ-साथ न जाने कैसे डर को महसूस करता रही। शाम को जब फुरसत मिली तो ध्यान आया कि जो मेरे मुँह में लड्डू था वो स्वाद पाए बिना ही कब का घुल चुका था।

अब सोचा कि वो था कौन जिसने बगैर जाने अपनी खुशी का हिस्सेदार मुझे भी बनाना चाहा था। पल में सोच आई कहीं वो गलत आदमी तो नहीं था, वो लड्डू नशीला तो नहीं था। मुझे कुछ हुआ नहीं मैं तो ठीक हूँ। वो तो अचानक सामने आया और कहने लगा कि “आप भी मुँह मीठा कीजिए, मैंने नई बाइक ली है”। मैंने उसे बधाई दी और संकोच में लड्डू का टुकड़ा उठा लिया परन्तु मन में एक अड़चन थी पता नहीं कैसा आदमी है? कैसी सोच में मुझे लड्डू दे रहा है। ऐसा मेरे मन ने क्यों सोचा मुझे नहीं पता। क्या ये मेरा कसूर था या उस शहर का जहाँ आये दिन रेप की ख़बरें न्यूज चैनलों और अखबारों की सुर्खियां बनी रहती है?

खैर। इस सोच के साथ मन में इस बात की प्रसन्नता भी थी कि किसी ने मुझसे अपनी खुशी बांटी वरना आज कल तो लोग किसी का साथ ही नहीं पंसद करते क्योंकि आभासी इंटरनेट और डिजिटल दुनिया ने उनसे इंसानी सामाजिक बोध छीन लिया है। सबका मालिक मोबाइल जो ठहरा और खुशी भी उससे ही बाँट लेते हैं हैशटैग के साथ.. अगर गलती से भी कोई खुशी बांटने आ जाये तो अचानक ये खुशी गम में बदल जाती है। पर उस अजनबी इंसान ने खुशी भी बाँटी थी और वास्तविक लड्डू भी खिलाया था न कि मोबाइल से लड्डू के चित्र के दर्शन कराये थे।

कमरे में पहुंची तो अचानक लाइट नाराज होकर चली गयी।। शायद उसने मेरी डिजिटल वाली सोच तो नहीं पढ़ ली और मुझे छोड़ भाग गई। पर ऐसा नहीं था वो तो मुझे कुछ याद दिलाना चाहती थी और उसकी जीत भी हुई क्योंकि आखिर मुझे वो अजनबी इंसान याद आ ही गया।

चार पांच दिन पहले की बात थी। जिस गेस्ट हॉउस में मैं ठहरी थी वहां की लाइट आँख मिचौली खेल रही थी तो वो ही आदमी रात में हमें उस गर्मी से मुक्त कराने अपनी साइकिल से लगभग सात किलोमीटर दूर से आया था। फिर मेरी याद में वो धुंधला गया लेकिन उसे हमारी परेशानी ने याद रखा क्योंकि चार-पांच घंटे की जद्दोजहद के बाद ही वो हमें लाइट आने की खुशी की सूचना दे पाया था। अब वो और उसके लड्डू की याद ने मुझे बहुत खुश कर दिया। मन में ये भी आया कि ऐसी मेहनती लोगों को आगे बढ़ना चाहिए और फिर ये ग्लानि का भाव भी मेरे मन में जरूर रहा कि लड्डू लेते समय मन में संकोच और संदेह क्यों रहा। मुझे उस लड्डू को तुरंत खा लेना चाहिए था। लेकिन सामाजिक खबरों का बोध मेरे आत्म बोध पर भारी पड़ गया था। मेरी उधेड़बुन का कारण मेरी सोच नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव और सामाजिक सोच की वो दृष्टि थी जो आज हर नारी को हर पुरुष को संदेह की दृष्टि से देखने को विवश करती है। लड्डू के आत्म बोध ने ग्लानि का भाव पैदा दिया पर आप मेरी जगह होतीं तो क्या करतीं? बोलिये!! पुरुष साथी आप भी सोचिये मेरी इस ग्लानि के लिए जिम्मेदार कौन?

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शोभिता श्रीवास्तव विधि विज्ञान की अध्येत्ता हैं। मानवाधिकार, लैंगिक अधिकारों के मुद्दे पर लिखने और पढ़ने के अलावा कविताएँ और लघु कथा लिखना पसंद करती हैं। अभी एक लघु कथा संग्रह और किन्नर अधिकारों पर लेखन कर रही हैं। शोभिता मूलत: लखनऊ से हैं किन्तु अभी फगवाड़ा, पंजाब में रहती हैं। शोभिता से shobhita.srivastava16@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।


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