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मैं कभी मुतमईन महसूस नहीं करता। पहले सोचता था और परेशान रहता था कि क्यूँ? लेकिन अब शायद अंदाज़ा है कि ये बेचैनी जो हर वक़्त, हर काम में, हर मंज़र में रहती है, वो क्यूँ रहती है।

मुझे बिलकुल हद पे खड़े होकर नज़ारा देखने का शौक़ है। मेरा जी करता है कि मैं उस आख़री देहली पे खड़ा होके देख सकूँ। ये महसूस कर सकूँ कि बस इसके आगे कुछ नहीं है। और कि इस से आगे नहीं जाया जा सकता । वहाँ खड़े हो कर ये देख सकूँ कि इसके पार क्या है। मिसाल के तौर पे, अगर कोई पहाड़ है, तो उसकी सब से ऊँची चट्टान के ऊपर जाने की तमन्ना या किसी खाई के किनारे आख़री पत्थर पे खड़े हो के वादी देखने की आरज़ू। ये चीज़ें मुमकिन हैं, सो मैं ये ख़्वाहिशें पूरी भी कर लेता हूँ। लेकिन मस’अला अस्ल ज़िंदगी का है। यहाँ भी यही दिल करता है, लेकिन ज़िंदगी की दहलीज़ के पार मौत है, और कुछ दिखाई नहीं देता बहुत अँधेरा रहता है। लगता है कि ज़्यादा झुक के झाँकने की कोशिश की तो कहीं अपनी तरफ़ खींच न ले, या क्या ख़बर कुछ इतना हसीन नज़ारा हो कि जी मचल जाए। और जा कर वापस आना मुमकिन नहीं, ये बिलकुल खाई की तरह है।

ख़ैर, मौत से डर नहीं लगता लेकिन अभी दिल नहीं है, कुछ ज़िम्मेदारियाँ और कुछ वादे हैं जो निभाने हैं। हो सकता है कि ये सिर्फ़ बहाना हो।
सो मैं दहलीज़ पे तो नहीं लेकिन दहलीज़ से कुछ पहले बैठ गया हूँ। किसी दिन दिल हुआ तो कोशिश करेंगे, वैसे तो जा कर लौटना मुमकिन नहीं, लेकिन मैं कोशिश करूँगा ख़लाओं में झाँक सकूँ और लौट के तुमको मंज़र बतला सकूँ।

सो, जब मैं जाऊँ तो कुछ देर मेरा इंतज़ार ज़रूर करना।

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चूल्हे में कोयले अब कम पड़ने लगे, और रोटियों की ज़रूरत बढ़ने पर ही है.. अब वक़्त कुछ ऐसा आ गया कि कोयलों से काम नहीं चलेगा शायद..

कई सालों से इसी बात का डर था, और अब अंदेशा है कि सारे बुरे ख़्वाब सच होने को हैं, सारी उम्र जिस से भागता रहा वो शिकंजा गर्दन तक आ ही गया है..

अब आग अगर जलाए रखनी है तो अरमान, ख़्वाब, ख़्वाहिशें, ज़िद, रिश्ते, एहसास और दिल के वो हिस्से जो उसको धड़काते हैं, चूल्हे में झोंक देने होंगे… बेशक इतना धुंआ उठेगा के आँखों में जाएगा, और सब दिल से निकल के बहने लगेगा, आँखों के ज़रिए.. राख का ऐसा ग़ुबार उठेगा कि न कुछ दिखाई देगा, न कुछ समझ आएगा, बेबस हो कर, चलते रहना होगा।

और जब ये ग़ुबार छटेगा, तो इतने साल गुज़र चुके होंगे कि हर साल की ख़राश चेहरे पर नज़र आएगी, राख जिस्म पर यूँ जम चुकी होगी कि यादें भी धुंधला जाएँगी, रिश्तों में फ़ासले चाहे न-चाहे, आ ही चुके होंगे।

कई दिन से इन्ही ख़यालात की जंग चल रही है दिमाग़ में.. आज अपना कमरा समेटने लगा, कपड़ों के साथ बहुत कुछ है जो अलमारियों में रख दूंगा, इस उम्मीद में कि इक उम्र के सफर के बाद जब निकालूंगा तो सब ऐसा ही रहेगा, और इस डर के साथ, कि ये सिर्फ़ खुशफ़हमी है।

मैं अपनी अब तक की सारी ज़िन्दगी तय कर के रख रहा हूँ… अपने दोस्त यार, माँ-बाप, इरादे वादे, कुछ एक आधे इश्क़, जिनके टेंडर भरे हैं, खुलने बाक़ी हैं.. ख़्वाब हैं बड़े सारे .. कि एक पूरी ज़िन्दगी है, मैं, ख़ुद को अलमारी में रख के जा रहा हूँ, और जो जा रहा है, वो मैं नहीं हूँ… इन्ही बातों से लड़ता हुआ, कुछ कपड़े रख के निकल जाऊंगा साथ। जो गुज़र जाएगा, गुज़र जाएगा।

ये चूल्हा, सब कुछ खा जाएगा, मुझे भी, इक इस की भूख है, कि ख़त्म नहीं होगी… अब कोयले कम पड़ रहे हैं इसे कुछ और चाहिए..

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