लटकी हुई शर्त

गंगाराम, गंगाराम, नंगाराम, नंगाराम।

दुबला-पतला सींक सा लड़का गंगाराम और पीछे चिढ़ाती हुई उद्दंड लड़कों की टोली – गगाराम, गंगाराम, नंगाराम, नंगाराम… अच्छे-खासे नाम की ऐसी-की-तैसी कर दी थी बदमाशों ने। गगाराम इक्के-दुक्के के साथ विरोध करता, कभी-कभार लड़ भी जाता, लेकिन, जब लड़कों की पूरी टोली ही उसके पीछे पड़ गई हो, वह क्या करता। वह रोता, खीझता और अंत में भाग जाता। लड़के लोर-जोर से चिल्लाने लगते – भाग गया गंगाराम, भाग गया नंगा राम। ….गंगाराम अपनी बेबसी पर रोता। क्रोध से उसके नथुने फूल जाते, पर…

…समय भी कैसे पलटा खाता है। वही गंगाराम आज इलाके का प्रसिद्ध गंगा बाबू है और अभी जब ‘कुल्ही-पटान’ में उसके बाल-बच्चे सरपट घोड़े दौड़ाते हुए निकल जाते हैं तो उसके ‘गंगाराम, नंगाराम’ वाले साथी उजबक-से, उनके पीछे उड़ती हुई धूल को देखते रह जाते हैं।

वही गंगाराम आज जय-जय राम हो गया है। अर्थात, उसे देख कर लोगों के हाथ उठ जाते हैं –– जय राम जी की, जय राम जी की…

गंगाराम की सफ़ेद मूंछों के अन्दर ढंके मुँह में मंद-मंद हंसी बिखरती रहती है।

तब, आदमी बचपन में अलग होता है, जवानी में अलग और बुढ़ापे में अलग। खास कर बचपन का तो बाद की ज़िन्दगी से क्या मेल? उस पर भी, गंगाराम जैसे लोगों का? लेकिन है – और किसी का न हो, गंगाराम का है।

बात जिस इलाके की है, वहाँ पन्द्रह-बीस घर ठाकुरों के, और सौ-डेढ़ सौ घर, सरकारी भाषा में, कमजोर वर्गों के, ठेठ भाषा में, पासी, दुसाध, चमार और अहीर आदि के। अलबत्ता, सभी एक दूसरे से आवश्यक दूरियों पर। और जैसा कि होता आया है, पंद्रह-बीस घर ठाकुर, इलाके के सिरमौर, बाकी सब दुम हिलाते हुए पीछ-पीछे।

गंगाराम इन्हीं में से एक गरीब दुसाध का लड़का था। गंगाराम के बचपन में सिर्फ दुसाध भर कह देना काफी था, किसी विशेषण की ज़रूरत नहीं थी। वैसे हरिजन शब्द का भी इस्तेमाल किया जा सकता था। लेकिन इससे एक बड़े वर्ग का बोध होता है, जातिगत विशेषता का पता नहीं चलता। जाने-अनजाने में किस तरह सरकार ने एक वर्ग-चेतना का बीज बो दिया है। है न?

लेकिन, सरकार का क्या है? दुसाध को लड़की की शादी करनी है तो दुसाध ही खोजेगा। चमार को लड़की की शादी करनी है तो चमार ही खोजेगा। फिर, यह ‘हरिजन-हरिजन’ करने से इन बारीकियों का पता कैसे चलेगा?

खैर, सरकार की बात दूसरी है, गाँव-घर की बात दूसरी।

तो, गंगाराम इन्हीं में से एक गरीब दुसाध का लड़का था, कमजोर और दुबला-पतला जैसा कि मैं ऊपर कह आया हूँ। लेकिन जितना दुबला-पतला वह था, खाना उतना ही अधिक खाता था। लोग कहते – उसका पेट है कि पाताल, पता ही नहीं चलता। और जो वह इतना खाता है, वह जाता कहाँ है? अपने घर में तो ‘भुजी-भांड’ नहीं, इसलिए उसकी बात क्या करना, लेकिन जब ठाकुरों के घर किसी ‘क्रिया-करम’ में वह खाने बैठता, देखने वाले देखते ही रह जाते। और रामकिसुन बाबू की बेटी की शादी में तो कमाल ही हो गया।

शादी हो चुकी थी। भोज चल रहा था। गंगाराम जिस पंगत में बैठा था, उसके अगल-बगल और पंगतें थीं। लेकिन धीरे-धीरे सारी पंगतें उठ गयीं। गंगाराम की पंगत वालों ने थोड़ी देर गंगाराम के ‘हाथ बारने’ का इन्तजार किया लेकिन गंगाराम था कि खाए जा रहा था। हार-पार कर वे भी उठ गए।

कानाफुसी होने लगी – “कौन खा रहा है?”

“गंगाराम।”

“कहाँ का लड़का है? किसका लड़का है?”

“अरे, गाँव के एक दुसाध का लड़का है।”

आवाजें तेज होने लगीं – “कौन खा रहा है – कौन खा रहा है?” कौतुहलवश सभी उसे देखे जा रहे थे।

ताज्जुब की बात। उतनी व्यस्तता में भी रामकिसुन बाबू ने जब यह बात सुनी तो अपने को रोक नहीं सके। उसकी पत्तल के सामने एक कुर्सी डलवा कर बैठ गए। बोले “गंगाराम, तुम डरो मत, खाए जाओ।” फिर परोसने वाले को बुलाया और कहा – “तुम भी यहीं रुक जाओ और गंगाराम जैसे-जैसे खाते जाता है, तुम देते जाओ।” गंगाराम ने कृतज्ञतापूर्वक एक बार रामकिसुन बाबू को देखा और फिर खाने में जुट गया। ऐसा खाना बरस-दो बरस में भी तो नसीब नहीं होता है।

उधर अस्तबल में गंगाराम का बाप, हरखू चमार के साथ, घोड़ों के लिए सानी-पानी कर रहा था। बात वहां तक पहुँच गयी। बाप बेचारा तो शर्म से कट गया। उसने हरखू से कहा – “हरखू, जा के ज़रा उस हरामजादे को उठा लाओ तो भाई। पूरा गाँव तो उस ‘पेटू’ को जानता ही है, बाहर के बारातियों के सामने भी मेरी नाक कटा रहा है।”

हरखू एक अच्छे दोस्त की भांति हाथ-मुंह धो कर भोज-स्थल पर गया। करीब-करीब सभी लोग खड़े हो कर गंगाराम का यह तमाशा देख रहे थे। शरम हरखू को भी लग गयी – “हरामी, पूरी गरीब बिरादरी की नाक कटा रहा है। ऐसा तो नहीं कि आज ठूंस कर खा लेने के बाद कल से भूख ही नहीं लगेगी?”

सामने रामकिसुन बाबू को बैठा हुआ देखा तो एक बार ठिठका। लेकिन बात बर्दाश्त के बाहर होने लगी थी। लोग जोर-जोर से हंसने लगे थे। वह लपक कर गया और खप-से गंगाराम का हाथ ही पकड़ लिया। एक कोर मुंह में, एक कौर हाथ में। गंगाराम अचकचा गया।

रामकिसुन बाबू के मनोरंजन में बाधा पड़ी। फिर भी वे बिगड़े नहीं। शायद, अपनी लड़की की शादी थी, इसलिए। हँस कर बोले – “जाओ, अब खाओगे भी कैसे? चमार ने तो छू दिया।”

गंगाराम ने भी इसे महसूस किया – वह तो चमार से ऊँची जात का है। उसने धीरे से कौर पत्तल पर रखा और उठने लगा। यहाँ भी हंसी। उससे उठा ही नहीं जा रहा था। हरखू ने तो पकड़ ही रखा था – उसी ने तौलकर उठाया।

“क्यों पिल पड़ते हो इस तरह खाने पर?” बाद में हरखू ने उसे समझाने की कोशिश की थी – “यह ठीक है कि हमलोग देवताओं की तरह धूप, सुगंध और फूल की खुशबू सूंघ कर नहीं रह सकते। हमें एक पेट भात चाहिए ही चाहिए। लेकिन क्या इस तरह जलील होकर? यह भी ठीक है कि हमें कभी बढ़िया खाना नसीब नहीं होता और बाबू लोगों के यहाँ किसी अवसर पर ही ऐसा खाना मिलता है। लेकिन…”

गंगाराम ने बात काट दी थी। कहा था – “काका, मैं सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं खाता। मैं खा-खा कर इतना मोटा, इतना ताकतवर हो जाना चाहता हूँ कि मुझे जो लड़के रात-दिन चिढ़ाते रहते हैं, गंगाराम, नंगाराम कह के – मैं अकेले सब को सबक सिखा सकूँ।”

हँस पड़ा था हरखू। कहा था – “ठीक है, लेकिन वह ताकत एक बार पेट ठूंस कर खा लेने से नहीं आती है। उसके लिए तो रोज-रोज भर पेट खाना मिलना चाहिए।”

और रोज-रोज भर पेट भोजन का इंतजाम कर लिया था, गंगाराम ने।

वह दिन और यह दिन।

ठाकुर रामकिसुन के अस्तबल में घोड़ों को सानी–पानी खिलाता था उसका बाप। आज वह खुद एक अस्तबल का मालिक है। भोजन देखकर टूट पड़ने वाला गंगाराम खुद कितने लोगों का पेट भरता है।

दस कट्ठे में फैला हुआ उसका मकान। परिजनों से भरा, कुटुम्बों से गहगहाता हुआ उसका परिवार। कभी-कभी गंगाराम अपनी छत पर टहलता हुआ विगत इतिहास की तरह पूरे इलाके को देखता जाता है। देखता जाता है और सोचता जाता है। सोचता जाता है, किस तरह ‘लक्ष्मी’ ठाकुरों की बस्ती से सरकती हुई धीरे-धीरे उसके पास आती गयी। आन-बान और शान में जीने वाले ठाकुर किस तरह अपनी आन-बान और शान में ही खोखले होते गए और…

…और वह मन ही मन सर झुकाता है, उस हरखू काका के प्रति, जिसने उसे उस दिन हाथ पकड़ कर भोज पर से उठा लिया था। उठा लिया था और समझाया था। और समझ में आने के बाद उसे दूर-दूर तक लोगों की हंसी अपना पीछा करती हुई लगी थी। यह पेट। हाँ, यह पेट ही सारे अनर्थों की जड़ है। पहले इसी का जुगाड़। उसकी दृष्टि गयी थी, अपने हाथों पर — बहुत छोटे थे उसके हाथ। उसने अपने पिता जी के हाथों की ओर देखा था – वे रामकिसुन बाबू के अस्तबल में, सानी-पानी में फंसे थे। और सानी-पानी करते हुए उसके पिता एक दिन चल बसे थे। जाते-जाते वे अपने ‘पितृ–धर्म’ का पालन ज़रूर कर गए थे – गंगाराम की शादी करा गए थे।

गंगाराम छटपटा कर रह गया था। लेकिन, उसने हिम्मत नहीं हारी। कभी के ‘पेटू’ गंगाराम ने अपना पेट काट-काट कर किसी तरह एक बेटे को पढाया-लिखाया। कभी-कभी गंगाराम को हरखू काका की तरह गाँधी बाबा को भी प्रणाम करने का मन करता है, क्योंकि पढ़ने-लिखने के तुरंत बाद ‘मुनुवा’ को नौकरी लग गयी – बैंक में। मुनुवा ने बाद में समझाया था कि गाँधी बाबा ने ऐसी व्यवस्था कर दी है कि दुसाध, चमार, पासी आदि छोटी जात के लड़कों को, पढ़ने के तुरंत बाद नौकरी लग जाती है। अभी, दूसरा बेटा, शिवचरण बताता है कि ऐसा अम्बेडकर नाम के एक आदमी के कारण हुआ था। लेकिन, किसी के भी कारण हुआ हो, जैसे-जैसे उसके बेटे बड़े होते गए, दनादन नौकरी में लगते गए। मुनवा बैंक में, शिवचरण पुलिस में, हरिचरण ब्लाक ऑफिस में।

और गंगा राम अपने बड़े होते हुए हाथों की ओर हर्ष के साथ देख रहा था।

हरखू काका तब भी जीवित थे और समय-समय पर आते-जाते रहते थे। उन्होंने समझाया था – “बेटा, ऐसा नसीब किसी-किसी का ही होता है। किसी को धन मिलता है तो जन नहीं, और किसी को जन मिलता है तो धन नहीं। तुम्हारे पास अभी ‘धन’ और ‘जन’ दोनों हैं। थोड़ा बुद्धि-विवेक से काम लेना। धन से मति-भ्रम भी होता है। बाबुओं की तरह कुचलन से बचना।

बाबुओं का कुचलन। गंगाराम को हंसी आती है। बाबुओं में कुचलन नहीं होता तो आज क्या गंगाराम, गंगाराम होता? वह वही गंगाराम, नंगाराम ही नहीं रहता?

बाबुओं मे आन-बान और शान के अलावे एक और ‘कुचलन’ था – नई-नई लड़कियों का शौक। घर में अच्छी-भली पत्नियों के रहते पता नहीं, कहाँ-कहाँ से वे कैसी-कैसी लड़कियाँ उठा लाते थे। एक औरत से बंध कर रह जाये, वह क्षत्रिय कैसा? क्षात्र धर्म और मर्दानगी की यही परिभाषा थी उनके सामने। और यही परिभाषा ले डूबी उन्हें। ये दूसरी-तीसरी औरतें लाई ही जाती थीं तफरीह के लिए। ये पान खातीं, शराब पीतीं और तरह-तरह की फरमाइशें करतीं। बाबूलोग इन फरमाइशों को पूरी करते धीरे-धीरे चुकते जाते। हालांकि, इन औरतों में भी किसी-किसी ने इतिहास बना दिया और अपनी निष्ठा और कर्तव्य-परायणता के लिये आज भी इलाके में याद की जाती हैं। लेकिन इनकी तादाद बहुत कम थी। अधिकतर खप नहीं पायीं। और वे गहने-रुपये लेकर चलती बनीं।

हालाँकि बाबुओं ने कुछ को ‘पेशे’ में भी लगा दिया – कुछ आमदनी के लिए। लेकिन, डूबते को तिनका सिर्फ कहावत में ही सहारा दे सकता है। इन्हीं क्षणों में बाबुओं के यहाँ की ‘लक्ष्मी’ क्रमशः गंगाराम के हाथों पहुंचने लगी थी। बड़े-बड़े मौके संभाल दिए गंगाराम ने, बाबुओं के। तीनों कमाऊ पूतों के पैसे एक जगह इकट्ठे हो रहे थे। उनका इससे बढ़िया उपयोग क्या हो सकता था?

लेकिन, पैसे क्या यों ही दिए जा सकते थे? गंगाराम ने तो पहले हाथ जोड़ दिए थे – “मैं एक अदना-सा आदमी। क्या मुंह ले कर आप के दरवाजे पर पैसे ‘वसूल’ करने आऊंगा?”

दरवाजे पर के बाबू को ताव आ गया था – “मैं न उधार मांगने आया हूँ , न भीख। इतनी संपत्ति पड़ी है मेरी। रख लो एक।” कहा न, आन, बान, शान। और बस एक, दो, तीन…। गिनती का कोई अंत नहीं है न। फिर, बाबू भी बढ़ते गए – एक, दो, तीन…। और उधर गंगाराम नोटों की गड्डीयां गिन रहा था – एक, दो, तीन…।

इसी बीच एक दिन हरखू काका आ धमके थे। जी हाँ, इस बार ‘आ धमके’ थे। आये तो थे वे नेवता लेकर। इस बार रामकिसुन बाबू की पोती की शादी हो रही थी। लेकिन नेवता के पहले उन्होंने डाट पिलाई। कहा था – “गंगाराम इसी दिन के लिए मैंने तुम्हे सचेत किया था।”

“हुआ क्या काका?”

“होगा क्या खाक? मैंने अभी-अभी शिवचरण को दुखहरण बाबू की लड़की के साथ खलिहान में देखा। ये सब बुराइयां आती ही हैं धन के साथ। इसीलिए…”

“पर काका, बाबुओं ने एक समय हमारी बहू-बेटियों के साथ भी…”

“नहीं गंगाराम, बदला नहीं। और बदला भी…। तो इस तरह से तो बिलकुल नहीं।”

गंगाराम मायूस हो गया था।

बात आगे बढ़ाई थी हरखू काका ने – “ताकत है तो एक प्रतिकार करो।”

“कैसे?”

“रामकिसुन बाबू की बेटी की शादी वाली घटना याद है तुम्हें?”

गंगाराम का काला रंग भी सुर्ख होता हुआ नजर आया।

“मैं उस घटना की याद तुम्हें ‘छोटा’ करने के लिए नहीं दिलाना चाहता हूँ। वो तो तुम्हारे बचपन की बात है। मैंने तुम्हें भोज पर से हाथ पकड़ कर उठाया था – लेकिन तुम पत्तल हाथ में ही ले कर उठे थे। याद है?”

गंगाराम ने स्वीकृति में सिर हिलाया।

“और आज भी वही नियम चल रहा है। जब हम उनके यहाँ नौकर होते हैं तब की बात नहीं करता – तब तो हम खाते हैं, अपना जूठन आप साफ़ करते हैं और हमें मलाल नहीं होता। लेकिन। जब भोज-काज में ‘नेउत’ कर ले जाया जाता है, तब भी? उलटे, जब बाबुओं को हम नेउता देते हैं तो हमें ‘सूखा’ पहुँचाना पड़ता है। वे हमारे यहाँ बैठ कर नहीं खाते। और जो हम ‘सूखा’ देते हैं, पता नहीं, उसको वे खाते भी हैं या नौकर-चाकरों को दे देते हैं। इसके बारे में कभी सोचा है तुमने? समर्थ हुए हो तो जाति की इस दीवार को तोड़ो या फिर ऊँची जाति के होने के उनके दंभ को।” कहते हुए हरखू काका नीचे उतर गए थे। गंगाराम सोचता रह गया था।

धमाका हुआ था इस बार इलाके में। रामकिसुन बाबू की पोती की शादी में कोई भी ‘इतर’ जात खाने नहीं जायेगा। रामकिसुन बाबू अभी जीवित थे। सुना तो सन्न रह गये – “आखिर क्यों?”

गंगाराम ने ऐसा कहलवा भेजा है ।

रामकिसुन बाबू ने अपना विशेष विश्वास पात्र गंगाराम के पास भेजा – “मेरी ही पोती की शादी पर ऐसी प्रतिज्ञा क्यों?”

“यह सिर्फ संयोग है कि आप की पोती की शादी है। और हम खाने से कहाँ इनकार करते हैं? शर्त यही है कि खाने के बाद हम अपना पत्तल नहीं उठाएंगे। ‘नेउत’ कर ले जाते हैं तो समुचित सम्मान दीजिये। और यह सम्मान आप ने दिया तो फिर सब ने दिया – क्यों कि आप तो गाँव के सिरमौर हैं।”

यह बात भी सुननी थी? वह भी गंगाराम के मुंह से? गंगाराम रखता है शर्त, जिसका बाप रामकिसुन बाबु के अस्तबल में घोड़ों को नहलाते-धुलाते, सानी-पानी करते मर गया? समय सचमुच बड़ा बलवान है। गंगाराम एक ‘धनी दुसाध’ हो गया है, अब। अब, उसे सम्मान चाहिए?

“नहीं, यह नहीं होगा।” रामकिसुन बाबू चिल्लाये थे – “जा कर गंगाराम से कह दो, वह अपनी औकात पहचाने।”

कहने की ज़रूरत नहीं थी। अपनी औकात पहचानने लगा था गंगाराम। उसने पूरे इलाके में मुनादी करवाई – “शादी के दिन सबों का भोजन मेरे यहाँ।”

तनाव बढ़ गया था। खेमे बंदी होने लगी थी। गंगाराम को यह देख कर सुखद आश्चर्य हुआ कि ‘सम्मान’ पाने के लिए सभी ‘इतर’ लालायित थे, जो उसकी छांव तले आ खड़े हुए थे। गंगाराम अचानक अपने को बहुत ताकतवर आदमी समझने लगा था। रामकिसुन बाबू उसके सामने बौने लगने लगे थे।”

ठीक शादी के दिन बहुत बड़े भोज का आयोजन हुआ। ‘गाँव की बेटी’ की शादी में दुसाध-चमार सबों ने जा कर रामकिसुन बाबू के यहाँ काम किया ज़रूर – पर खाया नहीं किसी ने। खाना खाया समानांतर भोज में – गंगाराम के यहाँ। उस भोज में खाने के बाद जब हरखू काका जाने लगे तो गंगाराम ने रोक लिया – “मुझे अपने पैर छू लेने दो, काका। आज तुमने हमें आत्मसम्मान की ताकत बता दी। अगर तुम न होते…”

हरखू काका बूढ़े हो चले थे। आँखें भी धुंधली हो चली थीं। लेकिन उन धुंधली आँखों में भी जो चमक आई और गयी, उससे निहाल हो गया गंगाराम।

गंगाराम ने हरखू काका के उस ऋण को भी अच्छी तरह चुकाया है – उनके नाम से एक स्कूल खोल कर – ‘हरखू राम हाई स्कूल’।

क्या होगी इससे बेहतर श्रद्धांजलि? क्या होगा इससे बेहतर पैसों का उपयोग, ताकि वहां से और निकले मुनुवा, और निकले हरिचरण और निकले शिवचरण और, और-और बनें गंगाराम।

वह दिन और यह दिन।

गंगाराम की शर्त जहाँ की तहाँ लटकी हुई है। कितनी शादियाँ बाबुओं के यहाँ हुईं, कितनी शादियाँ ‘इतरों’ के यहाँ हुईं लेकिन, न उन्होंने इनके यहाँ खाया, न इन्होंने उनके यहाँ। पहले तो ‘सूखा’ भी चला करता था। अब तो वह भी बंद है।

गंगाराम, अलबत्ता, बाबुओं की मदद ही करता है – दरी, पेट्रोमैक्स आदि ऐसे अवसरों पर काम में आने वाली चीजें दे-देकर। कभी-कभी अपनी दोनों बंदूकें भी दे देता है, शादी-ब्याह के अवसर पर बाबुओं के यहाँ गोली छोड़ने का रिवाज चलाये रखने के लिए। अगर उधर बन्दूक चलाने वाला कोई न हुआ तो अपने बेटों अथवा पोतों को भेज देता है। लेकिन खाना? ना बाबा। खाने की वही शर्त। मंजूर है तो कहो, आते हैं।

कौन करेगा मंजूर? एक कोइरिन थी। रानी बन गयी तो बैंगन को टैंगन ही कहने लगी।

गंगाराम ने पूरे इलाके को बर्बाद कर दिया। कितने मेलजोल से भाईचारे के साथ रहते थे लोग। गंगाराम की सफ़ेद मूंछें फड़फड़ाने लगती हैं।