लौटूँगा धरती

हर बार लौट पाने का निश्चय
कहाँ बचा पाया हूँ अब

दर्द की हवा भर पाए
उससे पहले ही
ख़यालों की नाक में एक बेचैन गुदगुदी कर
हर प्रतीक्षा को छींक देता हूँ मैं

ख़ुद से दूर भागकर
धरातल के दूसरे सिरे से
ख़ुद के नज़दीक आता हूँ

गुनगुनाता हूँ
बढ़ जाता है मेरे गीतों का तापमान
हरेक स्वर के साथ मेरा घनत्व घट जाता है

आकाश के गुम्बद में लटका दूँगा अपनी आँखें
किसी चमगादड़ की तरह

मैं रात में बरसूँगा
अपने गिरने की गति में सारी हवाओं को चूमकर
भर ले जाऊँगा उन्हें धरातल के किसी छिद्र में
ख़ुद के साथ…