माँ और बेटी

एक रास्ता जाता है उनींदे गाँवों तक
एक रास्ता घाट पार कराने वाली नाव तक
एक रास्ता पंखधारी देह तक
माँ, मुझे सारे रास्तों के बारे में पता है।

दिन ठहर जाता है पेड़ के नीचे
और रात परियों के घर
सीढ़ियाँ फलाँगती आती हैं धूप और रोशनी
माँ, अब मैं तमाम उजालों को झेल सकती हूँ।

यह आकाश दरक उठता है रह-रहकर
यह आकाश खुद को गँवा बैठता है बादलों में
माँ, मैं तारों की शक्ल में,
सारे आकाश में छिटक गयी हूँ-
और इस आकाश में चल रही है एक निर्बन्ध नाव।

माँ, मेरे हिस्से आया है एक पोखर पानी
जिसमें डूब-तिर रहा है सारा गाँव।

“चल, परे हट मुँहजली, कुलच्छनी,
तू पड़ गयी न ढाई आखर के भँवर में!”