Jyoti Lanjewar

माँ

तुमको कभी नहीं देखा, जरी किनारी साड़ी में
न गले में मोतियों की माला, न कंगन कड़े पहने
रबड़ की चप्पलें तक नहीं तुम्हारे पैरों में
झुलसती धूप में जलते तलवे
झुले को ममता के साथ बबूल पर टांगे
तार कोल भरे कनस्तर ढोते
तुझे देखा मैंने माँ

चिंधियों से लपेटे नन्हें नन्हें पैरों पर दौड़कर आते
लाडले का पसीने भरा चुंबन लेकर
भूख से ऐंठती अंतड़ियों को भूलने की कोशिश करती
पानी बिना सूखे होठ
‘रोजगार सुरक्षा योजना’ में बन रहे
तालाब का बांध बनाते
तुझे देखा मैंने माँ

आँखों में आसुओं का पावस भर कर
तपती धूप जैसे जिंदगी
दोपहर का सूरज ढलने तक
बीनी हुई कपास पोटली में संभाले
एक एक कतार दर-कतार
बाल-बच्चों का भविष्य संवारते
तुझे देखा मैंने माँ

भीड़ भरी सड़क पर टोकरी संभालते
फटे आँचल में खुद को लपेटे
बुरी नजरों को धमकाते
भरे चौंक में हाथ में चप्पल लिए
तुझे देखा मैंने माँ

आँखों में चार दीवारों का सपना लिए
बहुमंजिला इमारतों की सीढ़ियों पर
गर्भ भार को संभाल पैर रखती
रेत सिमेंट का मलबा ढोती
तुझे देखा मैंने माँ

शामपहर में पल्लू की गांठ खोलकर
तेल नमक खरीदती
पांच पैसे मेरी हथेली पर धर कहती
मिठाई लेकर खा, लेकिन स्कूल ज़रूर जाना
पालने के नन्हें को दूध से लगाती
कहती – “आंबेडकर जैसे बनना बेटा
तब ही छुटेगा हाथ का तसला”
तुझे कहते सुना मैंने माँ

घर लौटते हुए तेज तेज कदम
अस्थिपंजर सी देह, घरगृहस्थी का बोझ
साहूकार का कर्जा, जैसे हल की फाल
सुबह श्याम रहते आधे पेट
लेकिन स्वाभिमान की खातिर
मुफ्त की रोटी का धिक्कार करते
तुझे देखा मैंने माँ

नामांतर संघर्ष के अगली पंक्ति में
नारा देती ‘नामांतर होना ही चाहिए’
पुलिस की लाठी हाथ पर झेलकर
हँसते-हँसते जेल में जाते हुए
पुलिस की गोली से शहिद हुए
इकलौते बेटे के लिए कहते हुए
अरे, ‘तुम भीमराव के लिए शहीद हुए
जन्म तुम्हारा सार्थक हुआ’।
पुलिस से कहते सुना मैंने
और भी होते दो-चार तो मैं
भाग्यशाली कहलाती।
अस्पताल में अंतिम घड़ियों में साँस लेते
दीक्षाभूमि को दान देते
कहते सुना मैंने माँ
एक होकर रहना, स्मारक बनाना।
अंतिम साँस में जय भीम कहते
सुना मैंने माँ।