मैं भूल जाती हूँ अक्सर

मैं भूल जाती हूँ अक्सर
कहे और सुने हुए शब्दों को
सम्भव है किसी दिन भूल जाऊँ मैं भाषाएँ,
भूल जाऊँ मैं आकृतियाँ
जिससे मानव निर्मित है…

भूल जाऊँ मैं ब्रह्माण्ड के सभी रस्ते
जो ले जाते हैं किसी ना किसी
गन्तव्य की ओर..
भूल जाऊँ मैं मर्यादाएँ, मान्यताएँ,
नियम और तरीकों को
जिस पर चलकर सभ्यता विकसित हुई..

भूल जाऊँ मैं मेरी पहचान
मेरा नाम और मेरी देह..
जिसकी देहरी के अन्दर
सांकल लगाए बन्द पड़ी हूँ
रह जाए अटका
बस सन्नाटों का राग
और मौन में गुनगुनाता प्रेम
पहचान सकोगे क्या तब भी मुझे…??

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