मैं पढ़ता रहूँगा और लिखता भी।

मैं पढ़ता हूँ बेहद कम
और लिखता हूँ बे-कनार
लेकिन कहना चाहूंगा कि –
जो पढ़ता हूँ
रखता हूँ याद।

जब पढ़ता हूँ –
केदारनाथ जी की “पांडुलिपि”
या की उनकी “मातृभाषा”
विनोद जी की कविताओं में छत्तीसगढ़ी,
जैसी भाषा।
निर्मल वर्मा का “अंतिम अरण्य
या भीष्म का कोई अफ़साना।

जब पढ़ता हूँ –
रश्मिरथी, प्रेमचंद या मधुशाला।
जब पढ़ता हूँ इंशा जी को
बनकर पाठक दीवाना।

जब सस्पेक्टेड से सिलेक्टेड
और प्लूटो की नज़्में रटता हूँ।
ग्रीन पोयम्स में आए कोहसारों पर,
किसी बैत के नशे सा चढ़ता हूँ।।
जब फ़िराक़-फ़राज़-ओ-जौन की
ग़ज़लें और फ़ैज़ की नज़्में पढ़ता हूँ।

“विचार नहीं होती मन की हर प्रतिक्रिया”

मुक्तिबोध जी कहते हैं।
और अज्ञेय का कहना है कि –
मौन स्वयं है अभिव्यंजना।।

तब मुझको यह लगता है,
अक्सर, यकसर लगता है।

की अभिव्यक्ति के नाम पर यारों
कुछ अगड़म-बगड़म लिख देना,
और उसमें इल्म लपेट-लपेट कर,
तमाम जहाँ को सीख देना।
यहां वहां की बात उठाकर,
ऐसे-वैसे बक देना
शब्दों, लफ्ज़ के तुक बनाकर,
ऊपर-नीचे रख देना,

साहित्य नहीं है, अदब नहीं है
और नहीं है लिट्रेचर।

“यह नहीं है तो क्या है”
का सवाल मुझे अब घेरे है
तब भी मुझको घेरे था,
अब भी मुझको घेरे है

जिससे बाहर निकलने खातिर –
मैं पढ़ता रहूँगा
और लिखता भी।