कविता: ‘मैं तुम्हें प्यार करता हूँ’ – एरिश फ्रीड 

अनुवाद – प्रतिभा उपाध्याय

मैं तुम्हें प्यार करता हूँ
इसलिए नहीं कि तुम ऐसी हो
अपितु इसलिए कि मैं ऐसा बन जाता हूँ
जब मैं तुम्हारे साथ होता हूँ

मैं तुम्हें प्यार करता हूँ,
उस सबके के लिए नहीं
जिससे तुमने खुद को गढ़ा है
अपितु उसके लिए
जो तुम मुझे बना रही हो

मैं तुम्हें प्यार करता हूँ
मुझे बेहतर “मैं” बनाने के लिए
क्योंकि तुम बेहतर बनाना जानती हो

मैं तुम्हें प्यार करता हूँ
क्योंकि तुमने मेरे लबालब भरे दिल पर हाथ रखा है
और तुम उन सब ओछेपन और कमजोरियों को अनदेखा करती हो
जिन्हें कोई अनदेखा नहीं कर सकता,
और वह सब
जो सुंदर और अच्छा है,
तुम जाहिर करती हो जिसे देखने के लिए कोई अन्य इतना गहरा नहीं उतरा है

मैं तुम्हें प्यार करता हूँ
क्योंकि मेरे बेसुरेपन के लिए
बंद रखती हो तुम अपने कान
और उसकी ज़गह
अद्भुत प्रच्छन्न श्रवण से
भरती हो मुझमें संगीत तुम

मैं तुम्हें प्यार करता हूँ
क्योंकि तुम मेरी मदद करती हो
मेरे जीवन के निर्माण में,
एक सराय का नहीं,
अपितु एक मंदिर का निर्माण करने में
ठीक वैसे ही तुम मेरी भी मदद करती हो,
क्योंकि मेरे दैनिक शब्द दोषारोपण नहीं,
अपितु मधुर धुनें हैं

मैं तुम्हें प्यार करता हूँ
क्योंकि मेरे भाग्य में तुम्हारा योगदान है
शायद ही कोई अन्य इसे कर सका होता
और तुमने बिना किसी स्पर्श के इसे कर दिया
बिना किसी शब्द के, बिना किसी संकेत के

तुमने आसानी से इसे कर दिया कि
तुम तुम ही हो
और शायद यही है वह
जो मित्रता का बोध कराता है

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