मरुस्थल मेरी कविताओं का

मेरे सीने में दफन है
मरुस्थल मेरी कविताओं का
शाम जब सुबह से थक कर
रात को अंगड़ाई लेती है
धीरे-धीरे हर एक कविता
को साँस आती है और मैं
घिर जाता हूँ उनकी स्मृतियों से
पुनर्जीवित हो जाता हूँ
थपाक से गले मिलता हूँ
और उनकी सर्द गर्माहट
अपने अन्दर उतार लेता हूँ
और उनकी हैरान सलवटों को
स्पर्श करता हूँ.. और कहता हूँ..
मुझसे तुम नहीं.. तुमसे मैं हूँ
तुमसे ही तो मैं हूँ… तुमसे ही तो मैं हूँ
एक दिन मुझे भी यहीं पाओगी तुम्हारे बीच
और वो दिन दूर नहीं…