अम्मा कितना घबराया करती थीं उसकी पीठ पर मसूर बराबर मस्सा देख कर। वो मस्सा भूरे रंग का, उसकी पीठ की दाहिनी तरफ़ बाँह के पंखे पर था। अम्मा ने मस्से को पीठ पर से खतम करने के सौ-सौ जतन किए थे, पर ढीठ मस्से का कोई हल ना हो सका था। कहते हैं कि पीठ पर मस्सा होना ठीक नहीं, नाहक बोझा ढोते ज़िंदगी बीत जाती है।

शादी हुई, उसको पति मिला सपनों के राजकुमार वाली छवि से बिल्कुल उलट- मदिराभोगी, परस्त्रीगामी, और पत्नी-अवहेलक। इन सबका कसूरवार वो पीठ के मस्से को ही मानती थी। स्व का आत्मबोध व्यक्ति को जितना प्रभावित कर सकता है, उतना किसी महात्मा का वचन नहीं। एक दिन उसने सोडा और चूना मिलाकर मस्से पर रख दिया। तीन दिन तक यही प्रक्रिया करके उसने अपार पीड़ा सही किंतु संतोष ये था कि तीन दिन बाद मस्सा तो जल चुका था, पर तिल बराबर अपना वंश छोड़ कर।

जीवन-दुख की आँच मंद करने के लिए उसने सहकारी योजना की कंपनी में नौकरी कर ली। नौकरी ने किसी भट्ठी के समान उसके जीवन-दुख को अपने आगोश में ले लिया। एक वकील साहब जो कानूनी सलाहकार के तौर पर अकसर कंपनी में आया-जाया करते थे, कब उसकी भट्ठी की आँच से प्रभावित होकर उसके मुरीद हो गये, वो जान ही ना सकी। उसके एक ओर सामाजिक बंधन था तो दूसरी ओर उसकी भट्ठी से सौ फीट ऊपर खिचड़ी पकाता उसका मन। वो ना तो सामाजिक बँधन से विमुख हो पा रही थी, और ना ही आसमान में पकती खिचड़ी को आँच लगा पा रही थी।

हर दिन वो सुबह अपनी भट्ठी में आँच लगाती और आसमान पर पक रही खिचड़ी को दिन-दोपहरी यदा-कदा चेक कर आती। एक फ़ुर्सत वाले दिन सोकर उठने के बाद उसने अपने हाथ को पीठ पर मस्से के ऊपर फेरा, उसके बड़े से मस्से ने जो तिल बराबर वंश छोड़ा था, उसी के पास सटे एक और तिल बराबर दूसरा मस्सा उभर आया था।