मेरा दावा

मनुष्य होने का मेरा दावा ख़ारिज़ हो गया
देवता तो मैं किसी कीमत पर न था
पशु होने की विचारधारा कभी जन्मी नहीं
मैं एक लम्बी कतार में
बहुत पीछे खड़ा तो था
पर मुझे याद नहीं, मैं क्या माँगने गया था!

चींटियों की अनुशासित पंक्ति में नहीं था मैं
न तितलियों के समूह से मेरा नाता था
मैं मछलियों की तरह न तैर सका
न पंछी बन आसमान में डूबकी लगा सका
मैं एक बड़े झुण्ड में शामिल था
पर मुझे याद नहीं, मेरा मकसद क्या था!

सबके पास अपनी-अपनी बोलियाँ थीं
अपनी भाषा थी, अपना मौन था
मेरे पास गालियाँ थीं, मैं कौन था!
जो मनुष्य होने के करीब थे,
वो मनुष्येतर होने की होड़ में
मनुष्य होने से भी रह गये
मैं एक ऐसे समाज का अंग था
जिसको ये पता न था, वो क्यों था!

आख़िर जो होना था, वही हुआ
मनुष्य होने का मेरा दावा ख़ारिज़ हो गया।